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कहानी: त्याग पत्र

सतेन्द्र पाँच साल पहले डिस्ट्रीब्यूटर दिनेश गोयल के यहाँ नौकरी करते थे। अपनी दस वर्षों की नौकरी में उन्होंने गोयल को अमीर बना दिया था। लेकिन गोयल ने उनकी निष्ठा, ईमानदारी और लगन की कोई कीमत नहीं की और उन्हें नौकरी से त्यागपत्र देने के लिए मजबूर कर दिया था। सतेन्द्र जी को गोयल ने इतना परेशान किया कि आखिर उन्हें नौकरी छोड़ना पड़ी।
नौकरी छोड़ने के दस वर्ष पूर्व जब सतेन्द्र जी ने दिनेश गोयल के यहाँ नौकरी की थी तब गोयल की हैसियत ज्यादा अच्छी नहीं थी। तब गोयल का व्यवहार सतेन्द्र के प्रति बहुत अच्छा था। तब वो कहा करता- तुम तो मेरे भाई हो, बहुत अपनापन दिखाता था। सतेन्द्र के अथक परिश्रम से गोयल का कारोबार खूब बढ़ गया था। पहले तो गोयल उनको तनख्वाह के अलावा कमीशन के रूप में अच्छी रकम देता रहा जो उनकी मेहनत के मुकाबले काफी कम थी। हर साल तनख्वाह बढ़ोतरी होने के कारण सतेन्द्र जी की तनख्वाह अच्छी खासी हो गई थी पर तनख्वाह से दस गुना कमाई वे गोयल को देते थे पर गोयल को उनकी तनख्वाह खटकने लगी थी, उसने उन्हें कमीशन देना बंद कर दिया था। फिर वो उन्हें ताने देने लगा, जूनियरों के सामने उनकी बेइज्जती करने लगा था। उसका मन तब भी नहीं भरा तो चपरासी से सतेन्द्र जी की बेइज्जती करना शुरू कर दी। सतेन्द्र रोज अपमान के कड़वे घूँट पीकर नौकरी कर रहे थे। उनकी उम्र पैंतीस साल की हो गई थी। उनके दो बच्चे थे जिनका खर्चा बहुत ज्यादा था। वे सोचते और कहीं नौकरी करूँगा तो इतनी तनख्वाह नहीं मिलेगी फिर परिवार का खर्च कैसे उठाऊँगा इसलिए अपमान सहकर भी वे नौकरी कर रहे थे। एक दिन सुबह ही वो सतेन्द्र जी पर बरस पड़ा बोला जितनी तनख्वाह में तुम्हें दे रहा हूँ उतनी तनख्वाह में मैं पाँच कर्मचारी रख सकता हूँ। उस दिन कुछ ज्यादा ही बेइज्जती कर दी थी गोयल ने सतेन्द्र जी की और फिर सतेन्द्र जी ने त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देते ही गोयल के चैहरे पर खुशी आ गई। सतेन्द्र चुपचाप ऑफिस से बाहर आ गए। घर पहुँचे तो पत्नी बोली आज बड़ी जल्दी आ गए क्या तबियत ठीक नहीं है। वे बोले तबियत तो ठीक है पर आज मैं नौकरी छोड़ आया, सुनकर पत्नी बोली ठीक किया आखिर कब तक ये अपमान से भरी नौकरी करते। अब आराम से कहीं और नौकरी ढूँढो घबराओ मत मेरे पास जो बचत है उससे कुछ महीनों तक घर का खर्च आराम से चल जाएगा। पत्नी की बात सुनकर सतेन्द्र जी को बहुत अच्छा लगा। दो दिन तक वे कहीं नहीं गए दो दिन बाद सोमप्रकाश जी का फोन आया वे बोले हमने सुना आपने नौकरी छोड़ दी। सतेन्द्र जी दुखी मन से बोले आपने ठीक सुना है, तो सोमप्रकाश जी बोले आ जाओ फिर मेरे पास आपके लिए काम है। यह सुनकर सतेन्द्र जी सोमप्रकाश से मिलने के लिए चल दिए। सोमप्रकाश जी उन्हें वीरेन्द्र जी के पास ले आए। वीरेन्द्र जी बोले हमने हाल ही में साबुन की फेक्ट्री खोली है उस के लिए हमें अच्छे डिस्ट्रीब्यूटर की आवश्यकता है। पहले हम गोयल जी को डिस्ट्रीब्यूटर बनाना चाहते थे पर हमें पता चला कि आपने वो नौकरी छोड़ दी है तो हमने फिर उन्हें ये कार्य नहीं दिया पर आपको हम डिस्ट्रीब्यूटर बनाना चाहते हैं, आप स्वतन्त्र रहोगे जितना काम करोगे उतनी कमाई। सतेन्द्र जी ने वीरेन्द्र जी की बात मान ली और दूसरे दिन से ही काम शुरू कर दिया। अब सारा पैसा सतेन्द्र जी को ही मिल रहा था। जो उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा था। उधर गोयल का पूरा कारोबार ठप हो गया था काम बंद करने की नौबत आ गई थी। जबकि सतेन्द्र के साथ चौबीस लोग काम कर रहे थे। सतेन्द्र जी का कारोबार खूब फल फूल रहा था। उन्होंने गोयल को बहुत पीछे छोड़ दिया था। गोयल को अपने किए की सजा मिलने लगी थी। उसकी साख चौपट हो चुकी थी, कर्मचारियों का वेतन तक नहीं निकल पा रहा था। जब गोयल को अपनी गलती का अहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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