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कहानी: ख़ुशकिस्मत

रामस्वरूप ने बाजार में सड़क के कोने पर अपनी दुकान लगा रखी थी वो उस दुकान पर कई तरह के सामान बेचा करता था यह दुकान वो पिछले दो वर्षों से लगा रहा था इससे उसकी गुजर बसर आराम से हो रही थी मगर दिवाली के पन्द्रह दिन पूर्व उस क्षेत्र क रंगदार रोहन ने बलपूर्वक उसकी दुकान वहाँ से हटवा दी थी । जब कमाने के दिन आए तब उसकी दुकान हटना उसके लिए बहुत दुखद था पर बिना दुकान के तो वो रह नहीं सकता था इस लिए उसने अपनी दुकान बाजार क्षेत्र से लगे हुए दशहरा मैदान के किनारे पर लगा ली थी। तीन दिन पहले तक वो धंधा नहीं चलने के कारण दुखी और निराश था उसे लग रहा था कि शायद इस बार की उसकी दिवाली फीकी मने मगर इन तोन दिनों ने उसकी तस्वीर बदल दी थी तीन दिनों में जो उसकी ग्राहकी चली वो उसके लिए अकल्पनीया था हुआ यह कि त्यौहार के कारण मुख्य बाजार में ग्राहकों की भीड़ उमड़ रही थी तहबाजारी करने वालों ने अपनी दुकान लगाकर सड़क सँकरी कर दी थी। इसे देख नगर प्रशासन हरकत में आया मेन मार्केट की सारी तहबाजारी की दुकाने हटा दी गईं तथा उन्हें दशहरा मैदान में अपनी दुकान लगाने के अनुमति पत्र दिए तथा दुकानों के लिए जगह भी आवंटित कर दी। रामस्वरूप को भी अनुमति पत्र मिल गया था। उसकी दुकान सबसे अच्छी लोकेशन पर लगी थी । इसका लाभ उसे यह मिला कि उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ी और जिस रोहित ने उसकी जगह छीनी थी उसे ऐसी जगह मिली थी जो मौके की नहीं थी और वो तीन दिन से मक्खी मार रहा था रामस्वरूप से वो उसकी दुकान की जगह छीन भी नहीं सकता था क्योंकि जगह नगर प्रशासन ने आवंटित की थी और अनुमति पत्र भी दिए थे। आज शाम को जब रामस्वरूप दुकान बंद कर के घर आया तो उसकी जेब नोटों से भरी हुई बच्चे और पत्नी इसलिए ख़ुश थे कि हर बार की तरह इस बार भी उनकी दिवाली धूमधाम से मनेगी। घर में पकवान भी खूब बनेंगे। सबको नए कपड़े मिलेंगे। रामस्वरूप तो सबसे अधिक इसलिए ख़ुश थे क्योंकि उनकी दुकान सबसे अच्छी चल रही थी लोग कह रहे थे यह सब किस्मत की बात है मुकद्दर रामस्वरूप का साथ दे रहा था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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