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कहानी: दामाद का घर

कौशल्या के दो बेटे एवं एक बेटी कुसुम थी। भरा पूरा परिवार होने के बाद भी वे पिछले दस सालों से अपने दामाद नरेन्द्र के साथ रह रही थीं। दामाद के यहाँ ही उन्होंने अंतिम साँस ली थी। अंतिम संस्कार के लिए जब नरेन्द्र ने उनके बड़े बेटे राजेश और अशोक को फोन पर सूचना दी तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि हम न अंत्येष्टि में आएँगे न तेरहवीं में तुम्हें जैसा उचित लगे वैसा कर लो। नरेन्द्र क्या करते उन्होंने जब यह बात कुसुम से कही तो वो बड़ी दुखी हुई। फिर सँभलकर बोली माँ का दाह संस्कार हमारा बेटा दीपक करेगा। नरेन्द्र बोले पर वो तो अभी आठ वर्ष का है। तो होने दो इससे दाह संस्कार करने में क्या अड़चन है। नरेन्द्र बोले ठीक है और कौशल्या का दाह संस्कार उनके पोते दीपक ने ही किया। दाह संस्कार से नरेन्द्र और दीपक अभी आए थे और सासू माँ के गुजरने के बाद उनके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे।
नरेन्द्र को पन्द्रह साल पहले की कई घटनाएँ याद आने लगीं जब उनके ससुर राघव कॉर्पोरेशन की नौकरी से रिटायर हुए थे। तब जो भी फंड के रुपये मिले उससे उन्होंने अपने दोनों मकान ठीक कराये थे तथा एक नया मकान भी खरीदा था। पेंशन का प्रावधान था नहीं सोचा था दोनों मकान किराये से दे देंगे और जो चार एकड़ जमीन है उस पर खेती कर के अपनी गुजर बसर कर लेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं दोनों मकानों पर दोनों बेटे बहुओं ने कब्जा कर लिया तीसरे मकान में वे कौशल्या के साथ रहने लगे। जमीन उनकी शहर से लगी हुई थी वे साठ वर्ष के होने के बाद भी उसमें खेती कर रहे थे जबकि दोनों जवान बेटे कभी आकर खेत में झाँकते तक नहीं थे। लेकिन फसल के समय आकर साल भर के लिए गेहूँ जरूर ले जाते थे। उन्होंने कुसुम को गेहूँ देने चाहे तो बहू बेटों ने नहीं देने दिए। कौशल्या बेटे बेटी में भेद करने वाली माँ थीं। वो कहा करतीं की माँ की जायदाद में बेटी का कोई हिस्सा नहीं जबकि राघव जी कहा करते थे कि जिस मकान में हम रह रहे हैं वो हम बेटी कुसुम को देंगे। इस पर कौशल्या उनका कड़ा विरोध करती थीं दोनों झगड़ पड़ते तो कुसुम कहती कि आप दोनों प्रेम से रहो मुझे कुछ नहीं चाहिए भगवान आपके दामाद को ठीक रखे तो हम तो वैसे ही सुखी हैं। एक बार की बात है जब सोयाबीन की फसल तैयार होकर घर में आ गई थी। अठ्ठाइस बोरे सोयाबीन हुई थी। जिसको बेचकर राघव जी को खाद बीज जुताई बुआई के बीस हजार रुपये चुकाने थे। पर तभी उन्हें गया में श्राद्ध करने जाना पड़ा, कौशल्या भी उनके साथ गईं। मकान की चाबी वो अपने बेटे अशोक को दे गई थीं दामाद को वो इतना महत्व नहीं देती थीं। पाँच दिन बाद जब वे घर आए और घर का ताला खोलकर देखा तो पूरे अठ्ठाइस बोरे सोयाबीन के गायब थे। पता चला पूरी सोयाबीन राजेश और अशोक ने मिलकर मंडी में बेच दी थी और रुपये आधे-आधे बाँट लिए थे। जब राघव ने उनसे रुपये माँगे तो बोले तुम क्या करोगे रुपयों का, हमें जरूरत थी तो हमने ले लिए। राघव अपना सा मुँह लेकर आ गए। गेहूँ की पूरी फसल वे पहले ही बेच चुके थे। छः क्विंटल गेहूँ जो उन्होंने बोने वा अपने खाने के लिए रखे थे वो भी राजेश तथा अशोक ने बेच दिए थे। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं था। बीस हजार रुपये की उधारी देना थी तथा बीस हजार रुपये में रबी की फसल की बुआई करना थी। दुखी मन से कौशल्या और राघव कुसुम और नरेन्द्र के पास आए और सारी बातें बताने लगे तो कौशल्या राघव पर झल्ला गयीं। वो अपने बेटों की बुराई दामाद से करने को सह नहीं सकीं। राघव बेचारे चुप हो गए फिर बोले चालीस हजार रुपये का खर्च है पैसे कहाँ से लाऊँ। कौशल्या बोली इनसे क्यों कह रहे हो मेरे पास कुछ पैसे हैं उससे सब कुछ हो जाएगा इसके बाद जब वे अपने घर आए और बक्से का ताला खोला तो देखा कि सारे जेवर रकम तथा पूरे दो लाख रुपये गायब थे। राघव और कौशल्या दोनों समझ गए थे कि यह काम भी उनके बेटों और बहुओं ने ही किया है। नरेन्द्र और कुसुम के तो आने पर प्रतिबंध लगा हुआ था। राघव अपना सिर पकड़कर बैठ गए तो कौशल्या बोली खबरदार जो मेरे बेटों के विरोध में एक शब्द भी कहा तो। उन्हें भूलकर भी बद्दुआ मत देना। राघव बोले मैं पुलिस में रिपोर्ट लिखाऊँगा मगर कौशल्या ने ऐसा नहीं करने दिया। दो दिन में राघव जी को यह तक पता चल गया कि जेवर कहाँ बेचे हैं और उनके पैसों से किस कंपनी के शेयर खरीदे हैं। पर कौशल्या ने यह कहकर उन्हें समझा दिया कि अपना सब कुछ तो उन्हीं का है। उन्होंने ऐसे ले लिया तो ठीक है। राघव बोले पर यह तो सोच अब हम बिना रुपये पैसों के कैसे रहेंगे। यह सुनकर कौशल्या कुछ नहीं बोलीं। दूसरे दिन दोनों दिनभर भूखे रहे दिन में चार बार चाय पीने वाले राघव जी को एक कप चाय तक नसीब नहीं हुई थी। शाम को मजबूर होकर वे कुसुम और नरेन्द्र के घर पहुँचे तो कौशल्या ने पहले ही कह दिया की बेटों को नरेन्द्र के सामने मत कोसना। वो दामाद है कोई हमारा बेटा थोड़ी है और कुसुम तो अब पराये घर की हो गई। उससे भी ऐसी वैसी बात मत कहना। राघव जी का तो भूख के मारे बुरा हाल था। कुसुम उन्हें देखकर समझ गई की कुछ तो गड़बड़ है। जब उसे पता चला कि दोनों ने सुबह से कुछ नहीं खाया है तो सबसे पहले उसने चाय बनाई फिर जल्दी से खाना बनाया और दोनों को भरपेट भोजन कराया। खाना खाने के बाद उनकी जान में जान आई। नरेन्द्र ने अपने पास से चालीस हज़ार रुपय राघव जी को दिए जिससे उन्होंने उधारी चुकाई तथा रबी की फसल बोई तथा अपने भोजन का प्रबंध किया। नरेन्द्र और कुसुम उनकी बीच-बीच में खबर लेते रहते थे। तथा उनकी रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी कर रहे थे। इसके बाद भी जब गेहूँ की फसल आई तो कौशल्या ने दोनों बेटों के यहाँ आठ-आठ क्विंटल गेहूँ भिजवा दिए और नरेन्द्र को तो एक सेर आटा तक नहीं दिया। कौशल्या ने तो यह तक कह दिया कि चुका देंगे तुम्हारे पैसे अभी हम जिंदा हैं। इस पर नरेन्द्र जी ने कहा मम्मी मैंने आपसे कब पैसे माँगे जो आप ऐसी बात कर रही हो। बात आई गई हो गई रिटायरमेन्ट के तीन साल बाद राघव जी का निधन हो गया। उस दिन कुसुम को लगा कि उसका मायका ही छूट गया माँ तो बेटों को ही चाहती है। जमीन जायदाद कौशल्या के नाम थी। उनके निधन के बाद बेटे बहू कौशल्या को बहला फुसलाकर अपने यहाँ ले लाए। उनकी चार एकड़ जमीन तीन करोड़ रुपये में बिकवाकर उन पैसों को पानी की तरह बहाया। जिस मकान में कौशल्या रह रहीं थी वो भी उन्होंने बिकवा दिया। जब कौशल्या के पास कुछ भी नहीं बचा तब वे उसे कुसुम के पास छोड़ आए। कुसुम ने अपनी माँ की निस्वार्थ सेवा की तथा नरेन्द्र ने भी उनका बड़ा ख्याल रखा। पूरे दस साल तक कौशल्या अपनी बेटी दामाद के यहाँ रहीं। मगर बेटे बहुओं ने उन से कोई वास्ता नहीं रखा। दोनों बेटे चार साल में अपना सब गँवा बैठे थे। कौशल्या को अपनी मौत के कुछ दिन पहले अपनी भूल का अहसास हुआ था। जिससे वो रात दिन रोती ही रहतीं थीं और कहा करतीं कि बेटी मैंने तेरे साथ बहुत अन्याय किया इसके लिए भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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