सतीश और रमेश दोनों सगे भाई थे। दोनों के हिस्से पंद्रह पंद्रह एकड़ कृषि भूमि आई थी पर बड़ा भाई सतीश कर्ज में डूबा हुआ परेशान रहता था जबकि रमेश उतनी ही जमीन में खुशहाल था। जबकि उसके पास उसके बूढ़े पिता रामप्रसाद और माँ सियाबाई भी रहती थी। दोनों भाईयों के बीच मनोमुटाव था। दोनों एक दूसरे से बात तक नहीं करते, देवरानी जेठानी में भी खूब बैर था जिसका कारण भी सतीश ही था। रमेश तो कई बार भाई से बोलने की कोशिश करता था पर सतीश हमेशा उसे देख कर मुँह फेर लेता था। वो उसकी तरक्की से बहुत जलता भी था जबकि सतीश ने बँटवारे के समय ट्रेक्टर जबरन हथिया लिया था और रमेश ने ट्रेक्टर अपने पैसों से खरीदा था। सतीश का ट्रेक्टर कबाड़खाने में पड़ा था और रमेश का ट्रेक्टर खूब चल रहा था रमेश उससे कमाई भी कर रहा था। उसके पास बड़ा थ्रेशर था और अनेक कृषि यंत्र थे जिनके किराये से उसकी अतिरिक्त आमदानी हो जाती थी। हाल ही में सतीश ने पाँच एकड़ जमीन पच्चीस लाख रुपये में खरीद थी उसमें बोर लगवाया था जिसमें भरपूर मात्रा में पानी निकला था। यह जानकर सतीश जल-भुनकर खाक हो गया था पर इसके अलावा और वो कर भी क्या सकता था। रमेश की पूरे गाँव में इज्जत थी वो ग्राम पंचायत का पँच भी था और रमेश की कोई इज्जत नहीं करता था। उसे लोग इतना महत्व भी नहीं देते थे कि उसकी बात का कोई ठिकाना नहीं था अपनी बात से पलट जाना उसका स्वभाव था।
उनके बीच पाँच साल पहले बँटवारा हुआ था। इसकी पहल सतीश ने ही की थी। रामप्रसाद जी के पास तीस एकड़ जमीन थी। उन्होंने दस दस एकड़ जमीन दोनों बेटों में बाँट दी थी व दस एकड़ जमीन अपने पास रखी थी। तब यह बात हुई थी की वो दोनों जिस बेटे के साथ रहेंगे वही उनकी दस एकड़ जमीन पर खेती करेगा तथा उनका सारा खर्च उठाएगा। तब सतीश ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि मैं किसी भी हाल में माँ बाप को अपने पास नहीं रखूँगा। रमेश ने खुशी खुशी अपने माता पिता के साथ रहना मंजूर कर लिया। यह व्यवस्था छः महीने चल पाई छः महीने बाद सतीश इस बात पर अड़ गया कि उस दस एकड़ जमीन में मुझे भी हिस्सा चाहिए। इस पर रामप्रसाद बोले तो फिर तुम हमें छः महीने अपने साथ रखो छः महीने रमेश हमें रखेगा। इस पर रमेश ने तो हाँ कह दी पर सतीश ने साफ इंकार दिया। इसी बात पर एक दिन खेत पर दोनों भाइयों में कहासुनी हो गई जिसने मारपीट का रूप धारण कर लिया। सतीश ने बेरहमी से अपने सगे भाई रमेश को पीटा। रमेश ने अपने बड़े भाई पर हाथ नहीं उठाया चुपचाप पिटता रहा। पिटते पिटते बेहोश हो गया तब तक और लोग भी आ गए और रमेश को अस्पताल ले गए। उसे कोई गँभीर चोट नहीं लगी पर उसके दिल पर गहरी चोट लगी थी। सबने कहा सतीश के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ मगर रमेश ने सख्ती से मना कर दिया। रमेश ने अपने पिताजी से कहा आप भैया को पाँच एकड़ जमीन देकर हमेशा के लिए झगड़ा खत्म कर दो। मैं आपके साथ आजीवन रहूँगा पर आपको कोई कष्ट नहीं आने दूँगा। रामप्रसाद जी ने रमेश की बात मानकर सतीश को पाँच एकड़ जमीन भी दे दी। अब हिसाब बराबर हो गया था। तहसील में नामांतरण दोनों के नाम होने के बाद उनके बीच कोई विवाद नहीं रहा था। ट्रेक्टर तो सतीश पहले ही छीन चुका था रमेश तो पिटाई के बाद पाँच दिन में ठीक हो गया था पर सतीश का जो हाल हुआ उससे उसे छः महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा। हुआ यह कि वो शहद के लिए छत्ता तोड़ने पेड़ पर चढ़ा और संतुलन बिगड़ने से गिर पड़ा जिससे उसके पैर और हाथ की हड्डी टूट गई थी। जिसे देखकर लोग यही कह रहे थे कि सतीश को अपने किए की सजा मिली है। जबकि रमेश अपने बड़े भाई को इस हालत में देखकर बहुत दुखी हो रहा था। अब रमेश ने पूरा ध्यान खेती पर केन्द्रित कर दिया था। पिताजी के कहने पर उसने दो भैंस और दो गाएँ भी पाल ली थीं। जिनकी देखभाल रमेश के माता पिता करते थे। उनके दूध बेचने से रमेश जी को ऊतिरिक्त आय भी होने लगी थी। सतीश आलसी किस्म का इंसान था जबकि रमेश फुर्तीला। यही कारण रहा की मात्र दो साल में उसने नया ट्रेक्टर खरीद लिया था। उसने जो नलकूप खनन कराए थे उनमें भरपूर मात्रा में पानी निकला था जिसने रमेश जी की तस्वीर ही बदल दी थी। इन पाँच सालों में रमेश पूरे बीस एकड़ जमीन का मालिक हो गया थे जबकि दूसरी ओर सतीश अपनी पाँच एकड़ जमीन बेचने के लिए ग्राहक ढूँढ रहा था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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