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कहानी: मीनू का रूबी

पूरे दो दिनबाद मीनू अपनी बकरी भूरी और उसके मेमने रूबी से मिली थी आज वो बहुत ख़ुश थी दो दिन से उस का रो रोकर बुरा हाल था उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था आज बेमन से स्कूल गई थी स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा था अभी थोड़ी देर पहले स्कूल से मुँह लटकाए हुए आई थी तभी रूबी की मैं मैं की आवाज सुनकर वह चौंकी और जब उसने बाड़े में देखा तो भूरी को अपनी ओर प्रेम भरी नजर से देखता पाया उसका मेमना रूबी उसे देख कर उछल उछल कर हर्ष प्रकट कर रहा था यह देख रूबी के पापा प्रकाश और'उसकी मम्मी नीरा भी खुश हो रही थीं घर में फिर से रौनक आ गई थी।
दो दिन पहले भूरी और रूबी को साहूकार छीतरमल का आदमी जबरदस्ती अपने साथ ले गया था कुछ महीने पहले प्रकाश ने साहूकार से पाँच हजार रुपये का कर्ज लिया था जिसका ब्याज अदा न कर पाने के कारण वो उसकी बकरी तथा उसके मेमने को जबरन खोलकर ले गया था प्रकाश बेबस होकर यह सब देखते रहे थे लेकिन छः वर्ष की नन्हीं मीनू के लिए यह ह्रदय विदारक दृश्य था उसी दिन से उसका रो रोकर बुरा हाल था अभी रुबी एक हफ्ते का तो था ही मीनू उसके साथ हमेशा रहती थी दो दिन तक रुबी इस कारण से स्कूल तक नहीं गई थी रूबी था ही इतना क्यूट और सात दिन बाद ही उसका ऐसे बिछड़ना मीनू के लिए असहनीय दुख था । दुखी तो प्रकाश और नीरा भी थे । भूरी दुधारू बकरी थी और बहुत सीधी भी थी । दो दिन तक प्रकाश पैसे की व्यवस्था में लगे रहे जब पैसे की व्यवस्था हो गई तब वे साहूकार छीतरमल के यहाँ गए उसे पूरे पैसे देकर हिसाब बराबर किया और भूरी तथा रूबी को अपने साथ लेकर आए तब कहीं उन्हे चैन पड़ा भूरी भी अपने घर वापस आकर बहुत खुश हुई थी और मीनू की तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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