दबंग नेता एवं राज्य के केबिनेट मंत्री सियाराम सरन आज लोकप्रियता का शिखर छू रहे थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री सरन दस वर्ष पहले शिक्षा विभाग में माध्यमिक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। वहाँ से वे नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे और आज कामयाब नेता बनकर उभरे थे।
सियाराम सरन जी का बचपन घोर गरीबी में बीता था। उनके पिताजी शिव सरन शराबी थे और कोई काम नहीं करते थे। उनकी माँ शीला मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करती थी। उसी में उनका पति शराब के लिए रुपये छीन लेता था। ऐसी परिस्थति में रहते हुए उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई बरखेड़ा गाँव में की थी। इसके बाद वे गाँव के मुखिया सोमेश्वर के लड़के अमित के नौकर बनकर शहर में आ गए थे। अमित ने शहर के महँगे पब्लिक स्कूल में एडमिशन लिया था। इसके साथ ही मुखिया जी ने सियाराम सरन जी का नवमी में एडमीशन सरकारी स्कूल में करा दिया था। सियाराम सरन जी का काम घर की देखभाल करना, बाजार से सामान लाना, चाय-नाश्ता और खाना बनाने का था, इसके अलावा और भी कई घरेलू काम करना था। जब अमित स्कूल चला जाता इस के बाद श्री सरन स्कूल जाते थे। स्कूल से आने के बाद श्री सरन जी को रात के आठ बजे तक बिल्कुल फुरसत नहीं मिलती थी। फिर वे आठ से ग्यारह बजे तक अपनी पढ़ाई करते थे। यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा फिर भी सियाराम जी ने हायर सेकेण्डरी में जिले में टॉप किया था। जबकि अमित बहुत कम नम्बरों से पास हुआ था। इसके बाद अमित ने कॉलेज में एडमीशन ले लिया जबकि सरन एक साल तक पूरी तरह अमित के नौकर बनकर रहे। साल भर बाद सरन का एडमीशन डी एड में हो गया दो साल में सरन जी ने डी एड कर लिया था। इधर अमित भी ग्रेज्युएट हो गया था। अमित तो गाँव चला गया पर सरन जी का चयन प्राथमिक शिक्षक के पद पर हो गया। साडन खेड़ी गाँव में उनकी पोस्टिंग हुई। यह गाँव बरखेड़ा से मात्र दो किलोमीटर दूर था। नौकरी करते हुए ही श्री सरन ने बी ए किया और फिर बी एड करने के बाद माध्यमिक शिक्षक बन गए। वहीं साजनखेड़ी की शाला भी माध्यमिक में उन्नत हो गई थी। सरन जी उसके शाला प्रभारी बना दिए गए थे। इसके बाद भी मुखिया उन्हें अपना नौकर ही समझते थे। तथा उनकी बेइज्जती का एक भी अवसर नहीं गँवाते थे। लोगों से कहते ऐसा करके मैं इसे इसकी औकात याद दिलाता रहता हूँ। नौकरी करना श्री सरन की मज़बूरी थी। नौकरी में उनका खूब शोषण हुआ अधिकारियों ने उनसे खूब बेगार कराई। एक बार पंद्रह अगस्त के दिन उनकी गाँव के सरपंच रमेश ने खूब बेइज्जती की, उन्हें कुर्सी तक से उठा दिया गया। श्री सरन स्वाभिमानी थे पर अपमान का घूँट पीकर रह गए। उन्होंने जवाब में एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन इससे उनकी गाँव में और अधिक लोकप्रियता बढ़ गई। वे सबकी दुख-मुसीबत में काम आते। जितना उनसे बन सकता था उतनी सबकी मदद करते थे। इस बेइज्जती ने उन्हें खूब आहत कर दिया था। उन्हें उदास देखकर उनकी पत्नी बोली मैं समझती हूँ नौकरी में आपका दम घुटता है। आपकी फितरत नौकर बनने की नहीं है मगर यह सब आप हमारे लिए कर रहे हो। मैं भी बी एस सी, बी एड हूँ मुझे नौकरी करने दो फिर आप नौकरी छोड़कर स्वतंत्र होकर जो करना हो वो करना। परिवार की सारी जिम्मेदारी मैं सम्हाल लूँगी। सियाराम सरन जी को अपनी पत्नी रीना की बात जम गई उन्होंने सबसे पहले रीना को अतिथि शिक्षक बनवाया इसके बाद रीना का चयन माध्यमिक शिक्षक पद पर हो गया। उसकी नियुक्ति भी साजनखेड़ी गाँव में हो गई थी। रीना को पहली तनख्वाह मिली तो उसने सियाराम सरन जी से कहा अब आप नौकरी छोड़ सकते हो। उसके कुछ दिनों बाद एक घटना घटी गाँव में पंचायत के चुनाव हुए जिसमें लगातार चार बार सरपंच का चुनाव जीतने वाला रमेश इस बार सरपंच का चुनाव बुरी तरह हार गया और इसका खास कारण सियाराम सरन थे। जनता रमेश से इसलिए नाराज थी क्योंकि वो श्री सरन की बेइज्जती करता था। हारने के बाद वो गुस्से में पागल होकर स्कूल पहुँचा। उस समय श्री सरन स्कूल में ही थे और रीना को कुछ समझा रहे थे। तभी रमेश ने चीखकर कहा अपने आपको क्या समझते हो। मुझे हराकर खुश मत हो मैं अब भी उतना ही प्रभावशाली हूँ। मैं तुम दोनों की नौकरी खा जाऊँगा। यह सुनकर इस बार श्री सरन चुप नहीं रहे बल्कि उसकी आँखों में आँखें डालकर बोले तू मेरी नौकरी क्या खाएगा अपने आपको जेल जाने से बचा ले यही बड़ी बात होगी। रमेश को सरन जी से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। हर समय निगाह नीची रखकर सरपंच साहब कहकर बात करने वाले सरन जी, जिन के मुँह से उनके लिए आदरणीय, माननीय, मान्यवर, आप जैसे शब्द निकलते थे वो आज तू करके बात कर रहे थे। रमेश तो उनसे तू तड़ाक से ही बात करता था। बोला मैं अभी भी सरपंच हूँ अभी मैंने इस्तीफा नहीं दिया है। एक जनप्रतिनिधि से इस लहजे में बात करने का नतीजा जानते हो। इस पर मैं तुझे सस्पेण्ड कराकर रहूँगा। यह सुनकर सरन जी बोले जा-जा तुझ से बहुत देखे हैं। पहले अपने आपको जेल जाने से बचा। इसके पहले की झगड़ा और बढ़ता ग्राम के युवा नेता अशोक ने कहा सरपंच जी आपको नहीं मालूम क्या सरन जी ने नौकरी छोड़ दी है तथा ये शहर के लीड अखबार के जिला संवाददाता बन गए हैं। यह सुनते ही रमेश का सारा गुस्सा कपूर की तरह उड़ गया। वो सीधे तू से आप पर आ गया। लेकिन सरन जी ने कहा मेरे पास तुम्हारे भ्रष्ट कारनामों के बहुत सबूत हैं और फोटोग्राफ भी हैं। तुम्हारी ऑडियो वीडियो भी मेरे पास है। अब तो रमेश गिड़गिड़ाने लगा था लेकिन सरन जी ने उसकी एक नहीं सुनी। शाम को वो सरन जी के कार्यालय आया तो उनके ठाठ देखकर दंग रह गया। बोला मुझसे दस लाख रुपये ले लो और सारे सबूत नष्ट कर दो। मुझ पर दया करो मेरा सारा कॅरियर चौपट हो जाएगा। पर सरन जी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। चपरासी ने रमेश को ऑफिस से बाहर कर दिया। दूसरे दिन जब अखबार में रमेश के खिलाफ खबर छपी तो उसके हाथों के तोते उड़ गए। उधर एस डी एम साहब का फोन सरन जी के पास आया जो कह रहे थे आप एस पी साहब से मिलकर रमेश के खिलाफ जो सबूत हैं वे सब सौंप दो। कलेक्टर साहब ने कहा है कि दोषी को हर हाल में वे कड़ी सजा दिलवाकर रहेंगे। और शाम को रमेश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। नौकरी से आजादी मिलने के बाद सरन जी अब पूरी तरह दबंग और मुखर हो गए थे। अखबार की ताकत उनके पास थी ही साथ ही वे बहुत अच्छे वक्ता तथा विद्वान भी थे। जिला संवाददाता होने के कारण उनकी शीघ्र ही पूरे जिले में पहचान बढ़ गई थी। एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री जी ने सरन जी का भाषण सुना तो मंत्र मुग्ध हो गए। इसके बाद सी एम साहब से उनकी नजदीकियाँ बढ़ गईं थी। उसका लाभ ये हुआ कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें पार्टी की ओर से विधायक का टिकट मिल गया। वे लोकप्रिय तो थे ही, चुनाव में भारी बहुमतों से विजयी हुए। जब विधानसभा का गठन हुआ तो पहली बार विधायक बनने के कारण उन्हें मंत्री तो नहीं बनाया गया पर मुख्यमंत्री ने उन्हें कह दिया अपने आपको मंत्री से कम मत समझना। मैं तुम्हारा कोई काम नहीं रुकने दूँगा। सियाराम सरन पॉवरफुल विधायक बनकर उभरे थे जिससे उन्होंने अपने क्षेत्र का तेजी से विकास किया। अब तो ये हालत हो गई थी कि शिक्षा विभाग के डी ई ओ, बी ई ओ और छोटे बड़े सारे अधिकारी उनकी कृपादृष्टि के याचक बन गए थे। उन्हें विधायक बने दो साल हो गए थे। तभी अचानक ऐसा हुआ जिससे मुख्यमंत्री जी की कुर्सी खतरे में पड़ गई। तब सियाराम जी ने अपनी राजनैतिक सूझबूझ से सारी स्थिति को सँभाल लिया तथा मुख्यमंत्री जी को मजबूत स्थिति में ला दिया। इसका ईनाम उन्हें ये मिला की मंत्रीमंडल के विस्तार में उन्हे स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री के रूप में शपथ लेने का अवसर मिल गया था और वे अपने दूसरे कार्यकाल में केबिनेट मंत्री थे और प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बन चुके थे। जिनका उनके विरोधी भी सम्मान करते थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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