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कहानी: सब्जी पूड़ी का ठेला

दो साल पहले शिवलाल जी का सब्जी पुड़ी का ठेला शहर के मुख्य स्थान चौक में लगता था। उन्हें एक दिन में चौदह घंटे तक फुर्सत नहीं मिलती इतनी सब्जी पुड़ी की बिक्री होती थी। वे तीस रुपये में पाँच पुड़ी एवं सब्जी देते थे। जिसे लेने के लिए लोग टूट पड़ते थे। आसपास काम करने वाले लोगों की कमी नहीं थी जो अपने सुबह का नाश्ता शिवलाल जी की दुकान से करते थे। आज वही शिवलाल की बहुत बुरी हालत थी वो भी उनसे हुई भूल के कारण। दो साल पहले अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत उनका ठेला चौक से हटा दिया गया था। इसके बाद उनकी लाख कोशिशों के बाद भी वे वापस अपना ठेला वहाँ नही लगा सके थे। वहाँ से हटने के बाद जहाँ उन्होंने अपना ठेला लगाया था वहाँ उनकी बिक्री बहुत कम थी। कहाँ तो उनकी दुकान पर छः नौकर काम करते थे और अब हालत ये थी की वे अकेले ही काम सम्हाल रहे थे। जिसमें अधिकाँश समय उनका फुर्सत में ही व्यतीत होता था। दो साल पहले तक सब कुछ ठीक था। तब उनके ठेले पर राजू काम करता था। राजू के हाथों में कमाल था वो सब्जी बनाता था पूड़ी भी वही बनाता था। शिवलाल जी तो भुगतान लेते थे। शिवलाल जी से भूल ये हुई कि जब राजू ने अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बात कही तो शिवलाल नाराज हो गए। उन्होंने वेतन बढ़ाने से साफ इन्कार कर दिया। कहा कि पहले से ही तुम्हें अच्छा वेतन मिल रहा है।बात यहीं समाप्त नहीं हुई राजू ने तो फिर कोई जिद नहीं की पर शिवलाल जी ने उसे काम से निकालने का मन बना लिया। वे उसके काम में खामी निकालने लगे, उसकी बेइज्जती करने लगे। राजू तब भी सब कुछ सहन करता रहा परंतु एक दिन अचानक उन्होंने राजू को काम से हटा दिया। हाँलाँकि राजू ने कहा भी मत बढ़ाओ सेलरी जो मिल रही है उसमें भी कटौती कर दो पर मुझे काम से मत निकालो। पर शिवलाल नहीं माने उन्होंने राजू को काम से निकाल कर ही दम लिया। इसके बाद दो दिन तक राजू दिन भर ठेले के पास बैठा रहा कि शायद शिवलाल जी का दिल पसीज जाए और वो उसे काम पर रख लें पर शिवलाल जी ने ऐसा नहीं किया। फिर राजू एक हफ्ते तक नजर नहीं आया। एक हफ्ते बाद जब राजू आया तो शिवलाल ने देखा की वो एक बिल्डिंग के जीने के स्पेस में बनी दुकान को ठीक करा रहा है। दो दिन तक वो अपनी दुकान जमाने में लगा रहा। दो दिन बाद उसने सब्जी पूड़ी की दुकान खोल ली। तब शिवलाल जी ने उसकी खूब खिल्ली उड़ाई ये तक कहा कि देखना यूँ सी मक्खी मारेगा, हमारे सामने थोड़ी टिक पाएगा। लेकिन यह क्या, शुरू दिन से ही राजू की दुकान पर भीड़ लगने लगी थी। और उनके ठेले पर भीड़ कम होने लगी थी। उन्होंने राजू की दुकान से एक प्लेट सब्जी पूड़ी मँगवाई और उसे टेस्ट करके देखी तो वही कमाल का स्वाद जो उसके होते उनकी ठेले की सब्जी पूड़ी में मिलता था। शिवलाल जी ने देखा पूड़ी मोटी और ज्यादा बड़ी थीं। सब्जी की मात्रा भी खूब थी। जबकि राजू को हटाने के बाद उन्होंने पूड़ी का आकार घटा दिया था और पूड़ी भी पतली कर दी थी। सब्जी की मात्रा भी कम कर दी थी। शिवलाल जी बोले देखना ये दुकान ज्यादा दिन नहीं चला पाएगा। इस हिसाब से तो ये तगड़ा घाटा उठाएगा। तब इसकी अक्ल ठिकाने आएगी। तब इसे ये दुकान बंद करनी ही पड़ेगी। जिन की उस दुकान को किराये से लेने का प्रस्ताव दुकान के मालिक ने उनके सामने कई बार किया था पर शिवलाल जी ने हर बार उन्हें सख्ती से मना कर दिया था। राजू ने खुद उस दुकान मालिक से बात की थी और दुकान मालिक ने उसे मान ली थी। इस तरह राजू की दुकान खुली थी। दूसरी और शिवलाल की दुकान से जिस ग्राहक ने सब्जी पूड़ी ली उस सब्जी में मरा हुआ काॅकरोच मिला। इसके बाद खूब हँगामा हुआ
शिवलाल जी हैरानी में थे। आज पहली बार ऐसा हुआ था। और दूसरे दिन अतिक्रमण विरोधी दस्ते ने उसे हटा दिया था। तभी से उनके दुर्दिन शुरू हो गए थे। जो आज भी चल रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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