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कहानी: रिश्तों की खटास

रोशनलाल ने पाँच साल पहले अपनी पत्नी कुसुम एवं ससुर रामलाल के कहने पर साले वीरेन्द्र को मकान खरीदने के लिए पूरे दस लाख रुपये बैंक से पर्सनल लोन लेकर दिए थे। जिसकी एक पाई भी वीरेन्द्र ने नहीं चुकाई थी। फोन उठाना बंद कर दिया था बात करना मिलना जुलना सब बंद हो गया था। ससुर ने भी कन्नी काट ली थी और पत्नी कुसुम की मनोदशा भी ठीक नहीं थी क्योंकि  वे पैसे उनके लिऐ बहुत जरूरी थे जो उसका भाई हज़म कर गया था।
रोशनलाल ने पूरे पाँच साल तक उस लोन की किश्त बैंक में भरी थी। दस लाख के अलावा तीन लाख का ब्याज भी भरा था। लेकिन वीरेन्द्र को इसका जरा भी मलाल नहीं था। जब वीरेन्द्र को पैसे लेना थे तब उसने रोशनलाल से बड़ी बड़ी बातें कहीं थीं जीजाजी आप मुझसे छोटे हो आपका पैसा खाकर मैं पाप में क्यों पड़ूँगा। ससुर रामलाल ने कहा था दामाद जी मेरी पूरी जवाबदारी है अगर मेरा बेटा आपके पैसे नही देगा तो मैं दूँगा लेकिन वे अब इस बात से इंकार कर रहे थे। कह रहे थे मैंने कब कहा ऐसा आप दोनों का मामला आप दोनों जानों मुझे इससे कोई लेना देना नहीं है। इस पर ससुर दामाद में खूब कहासुनी हुई थी जिससे कुसुम का मायका हमेशा के लिए छूट गया। इस बार वीरेन्द्र ने कुसुम से राखी तक नहीं बँधवाई थी। अपनी सगी बहनों को छोड़कर दूर के रिश्तों की बहनों से राखी बँधवा ली थी तथा उन्हें उपहार भी दिए थे। कुसुम ने इसकी शिकायत अपने माता पिता से भी की पर वे कुछ नहीं बोले उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। कुसुम रूआँसी होकर घर आई और फिर देर तक फूटफूटकर रोती रही। रोशनलाल ने वीरेन्द्र से ये तक कह दिया था कि भाई मेरा मूल दस लाख रुपये ही लौटा दो। तीन लाख का नुक्सान मैं बर्दाश्त कर लूँगा मगर वो तो एक रुपया देने के भी मूड में नही था। रोशनलाल जी को एक आवासीय भूखण्ड लेना था जो बीस लाख रुपये में मिल रहा था। दस लाख रुपये तो उन्होंने जी पी एफ से निकलवा लिए थे। दस लाख रुपये की कमी पड़ रही थी जो वीरेन्द्र ने देने से इंकार कर दिया था। रोशनलाल इससे परेशान हो गए थे। वे किराये के मकान में रह रहे थे। जिसके मालिक सुरेश ने उन्हें मकान खाली करने का नौटिस दे दिया था। रोशनलाल ने यही सोच रखा था कि वे अपने जी पी एफ की रकम तथा वीरेन्द्र से वापस किए अपने रुपयों से प्लॉट खरीद लेंगे और उस पर बैंक से हाऊस लोन लेकर मकान बना लेंगे। ताकि किराये के मकान से मुक्ति मिले मगर ऐसा नहीं हो सका था। इसी बात से कुसुम भी बहुत दुखी थी। रोशनलाल कह रहा था कि जानती हो जब मैंने वीरेन्द्र को दस लाख रुपये दिए थे तब इस भूखण्ड की कीमत रजिस्ट्री खर्च सहित आठ लाख रुपये थी। आज यह साढ़े बाइस लाख रुपये का पड़ रहा है। तब रेत बीस हजार रुपये में एक ट्रक आ रही थी अब अस्सी हजार रुपये में आ रही है। कुसुम बोली अब क्या करेंगे। वे बोले करना क्या कल से किराये के मकान की तलाश करेंगे। मैं अपने रुपये वापस पाने के लिए आज वकील से भी मिला था वकील ने कहा इसकी कोई लिखा पढ़ी है तुम्हारे पास। जब मैंने कहा नहीं है खाली जुबान के आधार पर दिए थे इस पर वकील ने कहा था तब तो अपना रुपया वापस पाने की उम्मीद करना छोड़ दो। रोशनलाल कुसुम से कह रहे थे कि देख लिया शराफ़त का नतीजा। ऐसा लगता है कि अब अपनी तो सारी जिंदगी किराये के मकानों में ही रहते हुए गुजरेगी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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