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कहानी: भले बुरे

कौशल्या की नुक्कड़ पर सब्जी की छोटी सी दुकान थी। आज सुबह उन्हें कोई पाँच सौ रुपये का नकली नोट थमा गया था। जिससे उनकी बोनी खराब हो गई थी पर दुकान बंद करने तक आज उनके साथ जो अच्छा हुआ उससे वो सुबह का हुआ नुक्सान भूल गईं। शाम को जब वो घर आई तो पाँच सौ के पंद्रह सौ रुपये ज्यादा लेकर आई आज उनका सारा सामान बिक गया था जिससे वो बहुत खुश थीं। सुबह जब कौशल्या जी ने अपनी दुकान खोली तो उस पर थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति आया उसने एक किलो टमाटर लिए तथा पाँच सौ का नोट दिया। कौशल्या जी ने वो नोट सरसरी नजर से देखा तो वो नोट उन्हें ठीक लगा। उन्होंने साठ रुपये टमाटर के काटकर चार सौ चालीस रुपये वापस कर दिए जिसे वो व्यक्ति लेकर फौरन चला गया। उस दिन की वो बोनी थी इसलिए कौशल्या जी ने गल्ले के सारे खुल्ले पैसे दे दिए थे। जब और ग्राहक आए और उन्हें खुल्ले पैसों की जरूरत पड़ी तो वो सामने अतुल किराना स्टोर पर गईं। तब पता चला कि वो नोट तो नकली है। कौशल्या की पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना तो वो दिन भर बैठकर नहीं कमा पाती जितना वो एक झटके में चला गया था। वो बड़ी देर तक उदास रहीं बाद में जब ग्राहक आने लगे तो वे उनमें ही रम गईं। दोपहर में अचानक उनकी दुकान के सामने एक कार आकर रुकी उसमें से कार में बैठे बैठे ही एक मेडम ने ककड़ी हरी मिर्च तथा हरा धना खरीदा। कौश्ल्या बोलीं चालीस रुपया हुआ है पर मेडम ने उन्हें पाँच सौ रुपये दिए तथा चैंज नहीं माँगी पूरे रुपये देकर चली गईं। ये सब इतनी जल्दी हुआ कि कोई कुछ कर ही नहीं सका। एक हजार रपये उनकी उस उधारी के आ गए जो डूब चुकी थी। पाँच सौ रुपये उसकी तरफ से आ गए थे। कौशल्या मन ही मन में कह रही थीं ये दुनिया सिर्फ बुरे लोगों की ही नहीं है इसमें भले लोग भी रहते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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