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कहानी: सरकारी नौकरी के फेर में

कुसुम की पच्चीस साल पहले जिस प्रापर्टी डीलर गोपाल कृष्ण से शादी होने वाली थी । वो आज शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमेन बन गया था जबकि उसके पति कमलेश अब भी स्टेनोग्राफर के पद पर ही कार्यरत थे। वे अपने अठ्ठाईस साल की सर्विस में सिर्फ एक डुप्लेक्स ले पाए थे वो भी बैक से हाऊस लोन लेकर जिसकी किश्त के रूप में हर महीने उन्हें पैंतालीस हज़ार रुपये जमा करना पड़ रहे थे दवाओं का खर्च निकालने के बाद आधी तनख्वाह बचती थी उसमें ही वे अपना गुजर बसर कर रहे थे दोनों बच्चों को भी वे एजुकेशन लोन लेकर पढ़ा रहे थे वे एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से थे और गोपाल जी की शहर के गणमान्य रईसों में गिनती होती थी। उनके ऑफिस में ही डेढ़ सौ कर्मचारी काम कर रहे थे जिन्हें वे पच्चीस हज़ार रुपये से लेकर दस लाख रुपये प्रतिमाह तक वेतन दे रहे थे। कुसुम से जब कमलेश ने गोपाल कृष्ण के विषय में बताया तो वो समझ तो गई कि ये वही हैं जिनसे उसकी शादी होने वाली थी ।
  पिताजी ने ही अपनी तरफ से इंकार कर दिया था जबकि वे लोग इस शादी के लिए पूरी तरह सहमत थे। उनकी दहेज की भी कोई माँग नहीं थी जबकि कमलेश से शादी पर उन्हें खूब दहेज देना पड़ा था । पच्चीस साल पहले जब गोपाल कृष्ण उसे देखने आए थे तो उन्होंने देखते ही कुसुम को पसंद कर लिया था। रिश्ता लगभग पक्का ही हो गया था आठ दिन बाद कुसुम के पिता फलदान लेकर जाने वाले थे तभी कुसुम की भुआ सुमन ने कमलेश के विषय में बताया कहा लडका सरकारी नौकरी करता है स्टेनो ग्राफर है अच्छा वेतन है कुसुम सारी जिंदगी सुख से रहेगी जोपाल कृष्ण प्रापर्टी ढीलर ही तो है आय भी अनिश्चित है। भुआ की बात सबको जमी और पिताजी ने गोपालकृष्ण को इंकार कर कुसुम की शादी कमलेश से कर दी शादी के बाद कुसुम कमलेश के साथ भोपाल में रहने लगी। उन्हें सरकारी मकान मिला था जिसमें वे रह रहे थे । कुसुम कमलेश से शादी करके अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझती रही थी लेकिन जब कमलेश का तबादला इंदौर में हुआ और यहा आकर उसे पता चला कि गोपाल कृष्ण तो यहाँ का सबसे अमीर व्यक्ति है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। कमलेश जैसे तो शहर में बहुत थे पर गोपाल कृष्ण पूरे शहर में एक ही थे जो सबसे प्रभाव शाली व्यक्ति के रूप मे जाने जाते थे। 
कमलेश को इस विषय में कुसुम ने कुछ नहीं बताया था। अगर डताती तो कमलेश गोपाल कृष्ण से उसका परिचय कराने की बात कहता तथा गोपाल जी के विशाल भवन में उसे मिलाने के लिए जाने की जिद करता। और कुसुम गोपाल जी से मिलना नहीं चाहती थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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