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कहानी: दिवाली के लिए पैसे की जुगाड़

हरिमोहन फर्नीचर के कारखाने में मिस्त्री का काम करता था वेतन भो ठीक ठाक था उस कारखाने में लगभग डेढ़ सौ लोग काम करते थे। लेकिन हरिमोहन को दो महीने पहले काम से निकाल दिया गया था। कारखाने का मैनेजर संदीप उस से चिड़ा हुआ था जिसके कारण उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा था दूसरी नौकरी मिल नहीं रही थी दिवाली का त्यौहार सिर पर आ गया था बिने रुपये पैसे के दिवाली का त्यौहेर कैसे मने उधार रुपये लो तो दस पर सेन्ट मासिक ब्याज कैसे अदा करो। आखिर हरिमोहन को उपाय सूझ हो गया पूरे'दो दिन तक वो घर का कबाड़ा इकठ्ठा करता रहा और आज उसने उसे बेचकर पूरे पंद्रह हज़ार रुपये लाकर पत्नी शोभा को दे दि और कहा बस यही रुपये हैं इसी में दिवाली मनाना है शोभा बोली ठीक इसी में दिवाली मना लेंगे।
मैनेजर संदीप अच्छा इंसान नहीं था वो कारखाने में काम करने वाली महिलाओं को बुरी नज़र से देखता था ढाई महीने पहले शोभा कारखाने में आई थी हरिमोहन को खाने का टिफिन देने तब संदीप की नज़र उस पर पड़ गई और उसके मन में बुरे भाव उत्पन्न हो गए। दो दिन बाद उसने हरिमोहन से कहा आखिर कब तक मिस्त्री का काम करोगे मैं सेठजी बे कहकर तुम्हें सुपर वाइजर बनवा दूँगा तीस पर सेन्ट वेतन भी बढ़ जाएगा और हाड़तोड़ मेहनत भी नहीं करना पड़ेगी हरिमोहन अच्छी तरह जानता था कि संदीप एक निहायत ही घठिया किस्म का इंसान है। इसमें जरूर इसकी कोई चाल होगी फिर कहने लगा तुम्हारी पत्नी कहीं काम करती है क्या? इस पर हरिमोहन ने कहा कि नहीं तो संदीप बोला तो कहो न उससे नौकरी करने की मैं सेठजी से बात चर उसको भी इस कारखाने मैं नौकरी दिला दूँगा। अब हरिमोहन को सारी बात समझ में आ गई थी उसे मैनेजर के ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था। पर कुछ कर नहीं सकता था उसने दो दिन की मोहलत दी थी दो दिन बाद जब संदीप ने हरिमोहन से जवाब माँगा तो हरिमोहन ने साफ शब्दों मना कर दिया कहा कि वो कहीं काम करना नहीं चाहती यह सुनकर संदीप को बहुत गुस्सा आया। और वो उस समय तो चला गया पर दूसरे दिन उसने हरिमोहन के हाथों में एक महीने की सैलरी देकर कहा कल से काम पर मत आना अड तुम्हारी हमें जरूरत नहीं है। हरिमोहन क्या कह सकता था गिड़गिड़ाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था संदीप सेठ का रिश्तेदार था तो सेठजी से भी कुछ कहना बेकार था। दिवाली से दो महीने पहले नौकरी से निकाले जाने के कारण हरिमोहन को बोनस भी नहीं मिला था। उसने काम की हर जगह तलाश की पर कहीं कोई काम नहीं मिला सारे बचत के रुपये खर्च हो गए थे और आज घर का कबाड़ भी बिक गया था । हरिमोहन ने तय कर लिया था कि अगर नौकरी नहीं मिलती है तो अपनी छोटी सी फर्नीचर की दुकान खोल लेगा । कम से कम भूखों मरने की नौबत तो नही आएगी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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