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कहानी: अवसर का लाभ

एक एकड़ जमीन से खेती की शुरुआत करने वाले राजेन्द्र कुमार जी मात्र दस वर्षों में ही सत्तर एकड़ जमीन के मालिक बन गए थे साथ ही कोल्हूखेड़ी गाँव के सबसे संपन्न किसान भी। इसके अलावा वे गाँव के सरपंच भी थे।
दस वर्ष पूर्व राजेन्द्र कुमार के पिताजी किशनलाल का जब निधन हुआ तब उन्हें पता चला कि वे उन्हें मात्र एक एकड़ जमीन ही देकर गए हैं। बाकी पूरी तीस एकड़ जमीन उनके सौतैले भाई विजय कुमार के नाम कर गए हैं। मकान के नाम से उसी एक एकड़ जमीन पर बनी छोटी सी टपरिया उन्हें दे गए थे। यह सब उनकी सौतेली माँ रूपा के कारण हुआ था। राजेन्द्र कुमार की माँ सरोज का तभी निधन हो गया था जब वे पाँच वर्ष के थे। इसके बाद किशनलाल जी ने रूपा से शादी कर ली रूपा से उन्हें एक लड़का हुआ जिसका नाम विजय रखा गया। विजय के जन्म लेने के बाद से ही राजेन्द्रकुमार जी के दुर्दिनों की शुरूआत हो गई थी। किशनलाल पूरी तरह से अपनी दूसरी पत्नी के कहने में थे। उन्होंने तीस एकड़ जमीन खुद ही खरीदी वो पैतृक नहीं थी। इसका फायदा रूपा ने उठाया। रूपा ने किशनलाल को अपनी बातों के जाल में फँसाकर सारी जमीन अपने लड़के विजय के नाम करा दी थी। कुछ दिनों बाद जब किशनलाल को रूपा की चाल समझ में आई तब उन्हें लगा कि वास्तव में उन्होंने अपने बड़े बेटे के साथ अन्याय किया है पर तब तक देर हो चुकी थी। अब किशनलाल जी के पास कुछ नहीं था मात्र एक एकड़ जमीन बची थी। उस पर भी रूपा की नजर थी पर  किशनलाल जी ने वो एक एकड़ जमीन राजेन्द्र कुमार के नाम करा दी थी। राजेन्द्र कुमार जब चौबीस साल के थे तब उनके पिताजी का निधन हो गया था। पिताजी के निधन के बाद रूपा ने राजेन्द्र कुमार जी को घर से निकाल दिया। उनकी रोशनी से छः महीने पहले ही शादी हुई थी। घर से निकाले जाने के बाद उन्होंने वो टपरिया ठीक कराई और अपनी पत्नी के साथ उस वीरान जगह पर रहने लगे। यहाँ उन्होंने नलकूप खनन कराया जिसमें भरपूर मात्रा में पानी मिला। उसमें मोटर डालकर गरमी में ही अपनी जमीन में राजेन्द्र जी ने धनिया बो दिया था। थोड़े से हिस्से में मक्का मूँग और उड़द भी बो दी थी। जब बारिश का मौसम शुरू हुआ तब धनिए के भाव आसमान पर पहुँच गए। दस रुपये किलो में मिलने वाला हरा धनिया अब बाजार में दो सौ रुपये किलो मिल रहा था सब्जी भी मँहगी हो गई थी जो उनके छोटे से खेत में खूब लगी थी। इससे राजेन्द्र कुमार जी को खूब लाभ हुआ बाकी सब लोग दुखी थे वहीं राजेन्द्र जी सब से सुखी दिखाई दे रहे थे। इसके बाद उन्होंने उसमें टमाटर के पौधे रोप दिए जबकि बाजार में उन दिनों टमाटर मात्र पाँच रुपये किलो बिक रहा था। और लोग उसे खेत से उखाड़कर फैंक रहे थे। वहीं राजेन्द्र कुमार जी टमाटर का रोप लगा रहे थे। जब उनकी टमाटर की फसल तैयार हुई तब टमाटर का भाव सौ रुपये किलो हो गया था। टमाटर की फसल ने उन्हें मालामाल कर दिया था। अब लोग खेत में टमाटर लगा रहे थे राजेन्द्र कुमार कह रहे थे यह सब फसल आने पर खूब रोएँगे आगे चलकर टमाटर फिर पाँच रुपये किलो पर आ जाएँगे। इधर राजेन्द्र कुमार जी ने अपने खेत में लहसुन बो दी। लहसुन उस समय दस रुपये किलो के भाव बिक रहा था। और जब लहसुन की फसल आई तब तक उसके भाव अस्सी रुपये किलो पहुँच गए थे। लेकिन राजेन्द्र जी ने एक किलो भी लहसुन नहीं बेचा पूरे चालीस क्विंटल लेहसुन उन्होंने रोक लिया था और तीन महीने बाद उसी लहसुन के भाव चार सौ रुपये किलो हो गए थे। राजेन्द्र कुमार जी को उस फसल से इतना लाभ हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। दो साल में उन्होंने बाईस एकड़ जमीन खरीद ली थी। लोग कह रहे थे उन्होंने गाँव से इतनी दूर जमीन लेकर अच्छा नहीं किया। पर उन्हें मालूम था आगे क्या होने वाला है। आने वाले तीन सालों में वे सत्तर एकड़ जमीन के मालिक बन गए थे। एक दिन इन्जीनियर्स की टीम गाँव में आई और सर्वे कर बोली की यहाँ बाँध बनेगा और उस बाँध में पूरा कोल्हूखेड़ा डूब में आ रहा था। लोगों की जमीन मकान सब डूब गए थे बचा था राजेन्द्र कुमार का खेत और मकान। उन सभी विस्थापितों को सरकार ने जो जगह दी वो राजेन्द्र कुमार की जमीन के आसपास ही थी।इसके बाद राजेन्द्र कुमार जी दिनों दिन तरक्की करते चले जा रहे थे। जबकि विजय को शराब की लत लग गई थी। उसने सारी जमीन बेच दी थी और अब मजदूरी कर रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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