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कहानी: कम पढ़ा लिखा

राम स्वरूप और शिवस्वरूप दोनों सगे भाई थे राम स्वरूप छठी कक्षा तक ही पढ़ा था जबकि शिवस्वरूप ने गणित में प्रथमश्रेणी में एम सी की डिग्री ली थी तथा बी एड किया था शिवस्वरूप की उम्र बयालीस वर्ष की हो गई थी और अभी तक बेरोजगार था उसकी शादी भी नहीं हुई थी जबकि राम स्वरूप शहर के सबसे अच्छे रोशनी रेस्टोरेन्ट का मालिक था उसकी शादी को पन्द्रह साल हो ग गए थे उसकी पत्नी का नाम जानकी था उसको दो बच्चे थे बच्ची का नाम अनुराधा तथा बच्चे का नाम अनुपम था दोनों शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ते थे रामस्वरूप की शहर के बड़े रईसों में गिनती होती थी वह रोटरी क्लब का अध्यक्ष था जबकि शिवस्वरूप पिता राम किशोर जी की पेन्शन के सहारे से रह रहा था। आज रामस्वरूप रात के ग्यारह बजे घर आया था । पत्नी से कह रहा था काम बढ़ता ही जा रहा है सुब्हसे शाम तक ग्राहकों की भीड़ कभी कम ही नहीं होती जितना माल बनाओ सब बिक जाता है।
रामस्वरूप के पिताजी पन्द्रह वर्ष पहले कृषि विभाग में बढ़े बाबू थे रामस्वरूप पढ़ नहीं पाया था इसलिए वे उसे हिकारत भरी नजरों से देखते थे सबके सामने उसकी बेइज्जती करते रहते थे । शिवस्वरूप उनका बडा बेटा था उस पर उन्हें बड़ा नाज था। राम स्वरूप बीस साल की उम्र से ही मजदूरी करने लगा था इससे उसके पिताजी उससे और भी अधिक चिढ़ने लगे थे रामस्वरूप हलवाई लालमन के सहायक के तौर पर काम करने लगा था शादी विवाह समारोह में वो लालमन के साथ जाता था तथा खाना तैयार कराता था। लालमन के साथ काम करते करते वो खुद एक अच्छा हलवाई बन गया था । रामस्वरूप की बहन सरोज की शादी में उसी ने खाना बनाया था तथा पिताजी के पूरे दो लाख रुपये बचाए थे शादी में तीनलाख रुपये रामस्वरूप ने अपनी कमाई से पिताजी को खर्च करने के लिए दिए थे फिर भी पिताजी उससे खुश नहीं थे शादी में उन्होंने शिवस्वरूप को आगे रखा तथा रामस्वरूप की उपेक्षा की रामस्वरूप ने इस पर ध्यान नहीं दिया रामस्वरूप जब तेइस वर्ष का था तब उसने जानकी से प्रेम विवाह कर लिया था जानकी उसके साथ रसोईए में शामिल थी वो पूड़ी बेलती थी वो भी मजदूरों के परिवार से थी। जब रामस्वरूप ने जानकी से शादी कर ली तो रामकिशोर बहुत नाराज हुए उन्होंने जानकी को बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया तथा रामस्वरूप को कुल का कलंक कहकर घर से निकाल दिया। जब रामकिशोर रिटायर हुए तब शिवस्वरूप एक सरकारी मिडिल स्कूल में अताथि शिक्षक था और उसे मात्र सात हज़ार रुपये तनख्वाह मिल रही थी। पर रामकिशोर इसी से खुश थे कि उनका बडा बेटा इज्जत की नौकरी तो कर रहा है रामस्वरूप की तरह कम पढ़ा लिखा हलवाई तो नहीं है। रामस्वरूप घर से अलग होने के बाद जानकी के साथ किराये के मकान में रहने लगा था मकान गली में था तथा गली से बाहर शहर का मुख्य बाजार था शादी का सीजन खत्म हो गया था अब हलवाई का काम भी बंद हो गया था जानकी और रामस्वरूप इन दिनों बेकार थे। एक दिन जानकी ने कहा कि क्यों न हम ठेले पर चाय नाश्ते की छोटी सी दुकान लगा लें रामस्वरूप को बात कुछ जमी उसके लिए पैसे जानकी ने अपनी बचत में से लाकर दिए थे । रामस्वरूप एक अच्छा कुक था उसने दूसरे दिन से ही चाय वाश्ते की ठेले पर दुकान लगा ली थी जानकी भी उसका सहयोग कर रही थी कुछ ही दिनों में दुकान चल निकली राम स्वरूप को जो लाभ हुआ उससे वो खुद हैरत में पढ़ गया धंधे में तो जोरदार कमाई हो रही थी। दो साल में राम स्वरूप ने अपना रेस्टोरेन्ट खोल लिया था जिसका नाम रोशनी रेस्टोरेन्ट था वो शादी पार्टी में तैयार भोजन भेजने का ठेका भी लेता था। राम स्वरूप तथा जानकी की रात दिन की अथक मेहनत रंग लाने लगी थी जो रेस्टोरेन्ट बीस बाई तीस की दुकान से प्रारंभ किया था वो फैलकर आठ हजार वर्गफीट के दायरे में आ गया था। बीते पन्द्रह सालों में राम स्वरूप ने उन्नति के शिखर को आखिर छू ही लिया था। दूसरी और रामस्वरूप के पिताजी राम किशोर ज्यादा बूढ़े हो गए थे शिवस्वरूप को नौकरी नहींमिली थी वो आयुसीमा पार कर चुका था नियमित शिक्षक के आने पर उसे अतिथि शिक्षक के पद से हटा दिया था। अब वे शिवस्वरूप के भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगे। कभी कभी उन्हें रामस्वरूप के साथ किए गए दुर्व्यवहार पर अफ़सोस जरूर होता था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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