हरीश वर्मा ऑफिस में एकाउण्टेन्ट थे जहाँ से उन्हें सत्तर हज़ार रुपये प्रतिमाह तनख्वाह मिलती थी। उन्हीं के बगल में एक ठेले पर धंधा करने वाला फेरीवेला श्यामलाल भी रहता था। आज हरीश नौ बजे ऑफिस गए थे और पूरे बारह घंटे में नौ बजे रात को घर आए थे। सर दर्द से फटा जा रहा था। दिन भर खूब काम किया था। लंच करने के लिए सिर्फ दस मिनट का वक्त मिला था। जबकि श्याम लाल ने कुल तीन घंटे ठैले की फेरी लगाई थी बाकी पूरे दिन घर रहा था। हरीश उसके ठाठ बाट देखकर हैरान रहते थे। आज श्यामलाल ने उनसे पूछ ही लिया था कि बाबूजी ऐसी कौन सी नौकरी कर रहे हैं आप जो रोज नौ बजे जाते हो और रात के नौ बजे घर आते हो।
हरीश जी ने कहा सरकारी विभाग में एकाउन्टेन्ट हूँ। श्यामलाल ने पूछा कितनी सैलरी मिलती है, हरीश गर्व से बोले पूरे सत्तर हज़ार रुपये महीने। यह सुनकर श्यामलाल बोला बस इतनी कम तनख्वाह और इतना सारा काम। रोज के तेइस सौ रुपये पड़ते हैं आपको घर का खर्च मुश्किल से निकलता होगा। यह सुनकर हरीश जी को तैश आ गया बोले- बोल तो ऐसा रहा है जैसे खुद लाखों रुपये रोज के कमा रहा हो। इस पर श्यामलाल ने कहा लाख रुपये रोज तो नहीं पर हाँ रोज ठीक-ठाक ही कमा लेता हूँ। इस पर हरीश बोले आज कितने रुपये कमा लिए। श्यामलाल बोला आज ज्यादा कमाई नहीं हुई तीन घंटे ही तो फेरी लगाई फिर भी खर्च काटकर पंद्रह हजार रुपये का लाभ हो गया। हरीश बोले में महीने भर की कमाई नहीं पूछ रहा हूँ, आज की कमाई पूछ रहा हूँ। तब श्यामलाल ने कहा मैं भी आप को अपनी एक दिन की कमाई ही बता रहा हूँ। आज मैंने साबूदाने और मूँगफली का ठेला लगाया था उस से ये लाभ हुआ है। फिर श्यामलाल कहने लगा पूरे पाँच क्विंटल साबूदाना और एक क्विंटल मूँगफली दाने ही बैच पाया था। साबूदाने का भरा बोरा एक क्विंटल भारी चार हजार रुपया क्विंटल के भाव से और फुटकर में सात हजार रुपये क्विंटल बेचा था। पाँच क्विंटल से पंद्रह हजार रुपये का लाभ हुआ था। हरीश वर्मा को ग्रेज्यूएट होने के बाद भी सत्तर हजार रुपये मिलते थे। और यह आठवीं पास महीने के पाँच लाख रुपये कमा रहा था। और उन से कई गुना अधिक ठाठ से रह रहा था। हरीश बाबू साल में इन्कम टेक्स देते थे। उसे टेक्स नहीं देना पड़ता था। गरीबी रेखा वाला कार्ड भी उस के पास है। जिस से महीने में एक बार मुफ्त के भाव राशन मिलता था। इसलिए वो खुश दिखाई देता था और हरीश बाबू परेशान हाल रहते थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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