दीपक में जब तक तेल बाती रहती है और वो जलता है तब सबका उसी पर ध्यान रहता है जलता हुआ दीपक रोशनी देता है जो अंधेरी रात में बेहद जरूरी होती है जलते हुए दीपक को हवा से आँधी से तूफान से बचाया जाता है रात बीतने के बाद तथा तेल बाती जलने के बाद जब वो दीपक बुझ जाता है तब किसी को उसकी कोई परवाह नहीं रहती।
बुझे हुए दीपक की तरह समाज में ऐसे लोगों की अच्छी खासी संख्या है जो अपने सुनहरे दिनों में महतवपूर्ण पदों पर विराजमान थे तब उनकी बड़ी पूछ परख थी कितने ही लोगों को उनसे काम पड़ता था और वे अहम में चूर होकर किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करते थे । आज जब वे पद पर नहीं है तो उनका रुतबा भी खत्म हो गया है। ऐसे लोगों का अहं खत्म नहीं होता जिसके कारण वे किसी से संपर्क नहीं रखते किसी को इस लायक नहीं समझते कि वो उनका दोस्त बन सके ये लोग अपने सुनहरे अतीत मैं खोए रहते हैं और एकाकी जिंदगी जीते हैं मगर अकड़ कम नहीं होती ये अभी भी अपने को वी आई पी समझते हैं और बाकी सभी को हेय नजरों से देखते हैं । इनके जीवन का अंतिम भाग बढ़ा दुखद होता है। बुझे चिराग में तो फिर तेल बाती रखकर जलाया जा सकता है ढला हुआ सूरज सुब्ह फिर दिखाई देने लगता है। लेकिन इंसान के साथ ऐसा कभी नहीं होता फिर उसे अंत तक वैसा रुतबा नहीं मिलता। धन दौलत यहाँ पर मायने नहीं रखती मायना रखता है हमारा व्यवहार हमारी मिलन सारिता जो हमें लोकप्रिय बनाती है। यह एक अटल सत्य जो पत्ते पुराने होकर जीर्ण हो गए हैं वे हवा के झोंके से टूटकर गिर जाएँगे हवा उड़ा के उन्हें कहाँ ले जाएगी ये कोई नहीं जानता। पेड़ पर नए पत्ते आ गए हैं और पेड़ ने भी उन्हें स्वीकार कर लिया लेकिन जो पत्ता ट्टट कर गिरा है वो फिर कभी हरा ताजा पत्ता नही बनेगा। जो कड़वा सत्य जान लेता है उसे झूठे ख्वाब सजाना अच्छा नहीं मानता।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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