जैसे ही रावण के पुतले में आग लगी तो दशहरा मैदान में जमा हजारों लोग खुशी से तालियाँ बजाने लगे सब ऐसे खुश हो रहे थे जैसे रावण के साथ सारी बुराइयाँ भी जलकर भस्म हो गई हैं ।पर ऐसा हुआ नहीं बुराईयाँ वैसी की वैसी थीं बुरे लोगों ने भी बुराईयों को छोड़ा नही था।
रिश्वतखोरी वैसे ही जारी थी मुनाफाखोरी चरम पर थी धोखा बाजी हो रही थी विश्वासघातियों की संख्या में कमी नही आई थी ।
फटेहाल आम आदमी से कार वाला सूटेड बूटेड आदमी यह कहकर रिश्वत ले रहा था कि सूखी तनख्वाह से क्या होता है अगर वो रिश्वत नहीं लेगा तो उसके बीवी बच्चे भूखे मर जाएँगे। अवसरवादी लोग भी कम नहीं हुए। लूट डकैती चोरी ठगी खूब हो रही थी अपराधियों को संरक्षण देने वालों की भी कमी नहीं थी महिलाओं पर?अत्याचारों मे कमी नहीं आई थी रावण के सिर्फ पुतले का दहन हुआ था रावण करोड़ों रूपों में आज भी जिंदा था और खुलकर अपनी मनमानी कर रहा था रावण की आसुरी सेना का भी नाश नहीं हौआ था पूरी सेना आम लोगों के बीच में जाकर उन पर अत्याचार कर रही थी। लोग बेबस होकर असुरों के बढ़ते हुए प्रभाव को देख रहे थे बुराई के रावण ने अधिकाँश लोगों को जकड रखा था। यह सब चलते ही रहेगा रावण दहन तो हर साल होता रहेगा और आम आदमी यह सोचकर खुश होता रहेगा कि उसके सामने रावण के पुतले का दहन हुआ इसके साथ हो बुराई का भी खात्मा हो जाएगा। पर ऐसा होगा नहीं अगर ऐसा हो जाता तो हर साल दशहरे पर रावण के पुतले को जलाने की नौबत ही नहीं आती। राम राज्य होता सबके साथ न्याय होता बुराई का नामोनिशान नहीं रहता लोग सब खुशहाल रहते कोई किसी के हकों को छीनकर नहीं खाता। अपराध होते ही नहीं डर खत्म हो जाता सब निर्भय होकर जीवन यापन करते।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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