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व्यंग्य: बिना मतलम के बुरा चाहने वाले

अक्सर हम जिनके बीच रहते हैं । जिन्हें हम अपना समझकर हर बात बताते हैं उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मन में ईर्ष्या पालकर बैठे रहते हैं यह लोग ऊपर से तो शुभचिंतक होने का दिखावा करते हैं पर भीतर भीतर हमारा बुरा चाहते हैं। और अगर संयोग से हमारा बुरा हो जाए तो यह झूठी सहानुभूति दिखलाते हुए हमारी परेशानियों को देखकर मन ही मन आनंदित होते हैं।
अशोक जी नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आर्थिक रूप से संपन्न भी हैं। वे गरीबी से उठकर अमीर बने हैं। उनसे सबसे अधिक जलने वाला नरेश उनका बचपन का दोस्त है जो अभी भी गरीब है । अशोक जी के दो लाख रुपये हजम कर के बैठा है। वो इस बात से सबसे ज्यादा दुखी रहता है कि अशोक जी इतने धनवान क्यों हैं । अशोक जी को उसको ईर्ष्या की आग में जलता हुआ देखकर अच्छा लगता है। अशोक जी की प्रतिष्ठा उसकी जलन का सबसे बड़ा कारण है। वो यह जानता है कि वो अशोक जी की बराबरी ज़िदगी में कभी नहीं कर पाएगा इसलिए वो उनसे हर समय जलन रखता है उन्हें दिन रात कोसता है बिना मतलब के बददुआएँ देता है जब उसकी बददुआओं का अशोक जी पर कुछ असर नहीं होता तो दुखी हो जाता है।। एक कहावत है हाथी अपनी चाल से अपनी मस्ती में चलता रहता है और श्वान उस पर भौंकते रहते हैं। वे श्वान इतने चालाक होते हैं कि भौंकते हुए कभी हाथी के पास नहीं जाते बस दूरी बनाकर भौंकते रहते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे हाथी के पास चले गए तो उनका काम तमाम होने में एक पल की भी देरी नहीं लगेगी। ऐसे ही कुछ लोग जिनकी तरक्की से जलते हैं वो अगर चाहें तो उन्हें पूरी तरह मिटाकर रख दें पर वे ऐसा करते नहीं हैं। ये जलना नर्क की आग में जलने से कम नहीं है बल्कि बढ़कर ही है। ऐसे लोग अगर अपनी सारी क्षमताएँ अपनी गरीबी दूर करने में लगा दें तो उन्हें धनवान होने से कोई रोक नहीं सकता मगर इनमें न इतना साहस होता न हिम्मत होती न ही ये जोखिम उठाना पसंद करते इसिलिए ये लोग जलन रखकर दुखी होते रहते हैं। इनका ये दुख कभी भी कम नहीं होता।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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