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पढ़े लिखों की कमाई (व्यंग्य)

आज के इस दौर में जब शिक्षित बेरोजगारों की अच्छी संख्या है। तब जो पढ़े लिखे उच्च शिक्षित युवा हैं वे बहुत कम वेतन में प्राइवेट में नौकरी करने को विवश हैं। उनसे ज्यादा रुपया तो कम पढ़े लिखे लोग छोटा मोटा काम कर के कमा रहे हैं।
शर्मा जी का ऐ सी खराब हो गया था जो मेकेनिक उसे सुधारने आया वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। एक घंटे में उसने ऐ सी सुधार दिया। कुछ सामान भी अपनी तरफ से लगाया जिसका चार हजार रुपये उसे मिला। तभी शर्मा जी का लड़का रोहित आया उसने एम बी ए किया था और बारह हजार रुपये महीने के वेतन पर नौकरी कर रहा था। उसकी तनख्वाह जानकर मैकेनिक को बड़ी हैरत हुई। क्योंकि दो हजार रुपये तो उसने शर्मा जी का ऐ सी सुधारने में कमा लिए थे। सामान तो दो हजार का ही लगा था। पूरे दिन में उसने आठ हजार रुपये कमाए थे। शर्मा जी का लड़का एम बी ए करने के बाद जितने रुपये महीने भर में कमा रहा था उतना पैसा तो वो मैकेनिक मात्र डेढ़ दिन में ही कमा लेता था। यही हाल प्रताप चंद के लड़के का था। उसने सिविल इंजीनियरिंग में बी ई की थी तथा सोलह हजार रुपये के मासिक वेतन में एक बिल्डर के यहाँ साईट इंजीनियर था। प्रताप चंद की चाय पकौड़े की छोटी सी दुकान थी जिसकी रोज की कमाई छः से सात हजार रुपये थी। प्रताप चंद जी की उम्र पैसठ साल की थी और अपनी कमाई से वे बहु बेटे और पोते की पढ़ाई का खर्च भी उठा रहे थे। उनका लड़का अपने पिताजी के काम को छोटा समझता था। उनकी दुकान पर जाना तक पसंद नहीं करता था। जबकि उसके सारे ठाट बाट प्रताप चंद जी की कमाई से ही बने हुए थे। शानदार मकान भी प्रताप चंद ने ही बनवाया था। प्रताप चंद अपने बेटे से कुछ कहते तो उसकी माँ बीच में आ जाती। कहती मेरा लड़का इंजीनियर है वो छोटे मोटे काम क्यों करेगा। उसे कोई कम पढ़े लिखों के काम करने के लिए थोड़ी पढ़ाया है। सभी की सरकारी नौकरी तो लग नहीं सकती इसलिए अधिकाँश उच्च शिक्षित युवा प्राइवेट में बहुत कम वेतन पर विवश होकर नौकरी कर रहे हैं। एक निजी स्कूल संचालक बच्चों से तो मोटी फीस ले रहा है लेकिन प्राइमरी टीचर को छः हजार रुपये, मिडिल पढ़ाने वालों को आठ हजार, हाई स्कूल वालों को दस हजार तथा हायर सेकेण्डरी पढ़ाने वालों को बारह हजार रुपये महीने वेतन के रूप में दे रहा है और पढ़े लिखे लोग इतने कम वेतन में काम कर रहे हैं। जो वेतन बढ़ाने की माँग भी नहीं कर सकते उन्हें तो हर वक्त अपनी नौकरी जाने का डर सताता रहता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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