सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: दोस्ती या दुश्मनी

आपके आसपास ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जिनके आपस के बर्ताव को देखकर आप यह अंदाज नहीं लगा पाएँगे कि ये दोस्त हैं या दुश्मन दूसरों के सामने एक दूसरे की जमकर बुराई करेंगे। और जब आपस में मिलेंगे तो खूब गलबहियाँ से अपनापन दिखलाएँगे यह लोग कभी आपस मे सबके सामने जोरदार लड़ाई करके भ्रम में डाल देते हैं ।लोग यही समझते हैं ।कि इनमें दुश्मनी ठन गई है अब यह आपस में कभी दोस्त नहीं बन सकेंगे।
ऐसे लोगों का भ्रम जल्दी ही टूट जाता है जब वो उनको आपस में प्रेम से बातें करते हुए देखते हैं। इनका जो बोच बचाव करता है वो मूर्ख सिद्ध होता है कुछ समझदार और अनुभवी लोग उनकी लड़ाई के बीच में नहीं पड़ते वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह लड़ाई ज्यादा देर तक नहीं चलने वाली थोड़ी देर बाद यह साथ बैठकर चाय पीते हुए नजर आएँगे। यह दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि वे एक दूसरे की खूब बुराई करते हैं फिर भी उनकी दोस्ती नहीं टूटती । इनकी दोस्ती की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि कोई हिला भी नहीं सकता।
ऐसे ही शहर में दिनेश और सुरेश की दोस्ती थी वे कभी कभी एक दूसरे की खूब बुराई करते थे कुछ दिनों तक उनका बोलचाल भी बंद रहता था । फिर उनमें अपनापा हो जाता था ऐसा कई बार हो चुका था दोनों के अपने अपने समाज सेवी संगठन थे । वे उनके आयोजन में एक दूसरे को मुख्य अतिथि अध्यक्ष बनाते रहते थे मंच उन दोनों के ही कब्जे में रहता था। दिनेश के संगठन का सम्मान समारोह था उस संगठन में सुरेश भी प्रमुख पदाधिकारी थे। समारोह के पहले दोनों भें एक दिन खूब तकरार हुई बहस इतनी गर्मागर्म हुई कि सुरेश ने दिनेश का संगठन छोड़ दिया। दिनेश जी जहाँ जाते वहाँ सुरेश जी की निंदा करना शुरू कर देते थे। सुरेश जी ने दिनेश जी के क्रार्यक्रमों में आना बंद कर दिया था। सम्मान समारोह की तारीख निकट आती जा रही थी दिनेश जी लोगों से चंदा इकठ्ठा करते हुए घूम रहे थे जिनका सम्मान होना था उनकी एकमात्र योग्यता यही थी कि वे दिनेश जी के करीबी थे उन्होंने मोटी धनराशि दिनेश जी को चंदे के रूप में दी थी। जब सम्मानित होने वालों के नामों की घोषणा हुई तो उसमें सुरेश जी का नाम देख लोग चौंक गए दिनेश जी ने आयोजन के पूर्व बैठकर रखी थी उसमें दोनों की घनिष्ठता देखने लायक थी दोनों आपस में खूब प्रेम से बातें कर रहे थे उन्होंने सबको दरकिनार कर दिया था। सम्मान समारोह में दिनेश जी ने सुरेश जी के खूब तारीफों के पुल बाँधे थे श्रोता उनकी बात सुनकर भीतर भीतर ये सोच रहे थे कि इन्होंने तो रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे दी।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...