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व्यंग्य: दूसरों की गिरहबान में झाँकने वाले

उन लोगों का क्या करोगे जो अपने लाखों ऐबों को छिपाकर दूसरों की गिरेहबान में झाँकते हैं। अपने बड़े से बड़े ऐब की भनक नहीं लगने देते और दूसरों की छोटी से छोटी बुराई को बढ़ चढ़कर बताते हैं।
यह लोग बातें बनाने में बड़े होशियार होते हैं । यह अपनी जुबान के कमाल से भले से भले आदमी को सबसे बुरा साबित कर सकते हैं यह झूठ भी इस तरह से बोलते हैं कि सुनने वाले को वो एकदम सच लगता है। रामनरेश जी की अपनी कॉलोनी में रहने वाले राकेश जी से कोई खास जान पहचान नहीं थी एक बार जब रामनरेश जी को उनसे काम पड़ा तो राकेश जी ने सहर्ष उनके कार्य को पूरा कराने में सहयोग दिया तबसे उनमें थोडी अच्छी जान पहचान हो गई एक दूसरे के हालचाल पूछने लगे । यह सब दिनेश जी से सहन नहीं हुआ वे रामनरेश जी से पता नहीं किस बात से खुन्नस खाए हुए बैठे थे। उन्होंने राकेश जी से मिलकर रामनरेश जी की बुराईयाँ करना शुरू कर दीं उसमें ज्यादातर झूठी थी पर दिनेश जी के कहने के लहजे से वे सच्ची लगती थी। जब तक दिनेश जी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा तब तक उनको रामनरेश जी से नफरत नहीं हो गई। नतीजतन राकेश जी ने रामनरेश जी से बोलचाल बंद कर दी। रामनरेश समझ ही नहीं पाए कि इनको अचानक ये क्या हो गया इन्हें ये नफरत कैसे हो गई वे इसका कारण नहीं समझ पाए वो तो जब उन्हें जरूरत पड़ी तब किसी ने उनका साथ नहीं दिया दिनेश जी ने भी उनसे कन्नी काट ली तब रामनरेश जी ने उनका साथ दिया । राकेश जी बोले आप तो भले इंसान हैं मैं तो आपको बहुत बुरा समझता था। इस तरह उनकी गलतफहमी दूर हुई। जिससे इन मतलब परस्त लोगों को काम होता है उसकी यह खूब खुशामद करते हैं। उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते जिस से इनका काम नहीं होता उसकी तरफ देखते तक नहीं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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