कुछ लोग ऐसे होते हैं कि थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं अधिक की कामना नहीं करते न ही इसके लिए प्रयास करते हैं। इसके विपरीत अनेक लोग ऐसे भी मिल जाएँगे जो पाने की अंतहीन होड़ में अपनी सारी जिंदगी गुजार देते हैं। जीवन जीने का सारा आनंद भूलकर पाने में ही लगे रहते हैं इनमें से कई ऐसे भी होते हैं जो इकठ्ठा तो बहुत कुछ कर लेते हैं। मगर उसमें से किसी को कभी बाँटते कुछ भी नहीं हैं।
शहर के चर्चित चेहरे किशोर सिंह ऐसे ही थे उनके पास सब कुछ असीमित था एक बार उनके घर पर जाना हुआ तो देखा कि उनका घर बहुत बड़ा था सम्मान मान पत्र स्मृति चिन्हों का ढेर लगा हुआ था पाँच बड़े बक्से इनसे भरे पड़े थे हजारों तो शाल थीं उनके पास इसके बाद भी सम्मान हासिल करने की उनकी भूख मिटी नहीं थी चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही पापड़ कंयों न बेलने पड़ें। । कुछ कंजूस टाइप के लोग करोड़ों रुपये के स्वामी होने के बाद भी गरीबों से भो बदतर जिंदगी जीते हैं। किशनलाल वो किसान था जिसके बैंक में पूरे पंद्रह करोड़ रुपया जमा थे फिर भी वो एक रुपया का भी कभी किसी को दान नहीं देता था। सबसे कम चंदा वो ही देता था । उसकी शादी हुई थी पर उसकी पत्नी उसकी कंजूसी से तंग आ कर उसे छोड गई थी। उसके जाने से किशनलाल बहुत खुश हुआ था क्योंकि वो उसे फिजूल खर्ची करने वाली मानता था अपनी कंजूसी के कारण उसने कहीं दूसरी शादी भी नहीं न धन दौलत का खुद उपयोग कर रहा था न किसी को करने दे रहा था। कहा जाता है कि अति बुरी होती है यदि जीवन को सार्थक आनंदपूर्ण एवं खुशियों भरा बनाना है तो एक संतुलन कायम करना पड़ेगा और अति से बचना होगा ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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