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व्यंग्य: क्या वाकई शराफ़त का ज़माना नहीं है

कई लोग अक्सर यह कहते नजर आते हैं कि आजकल शराफत का ज़माना नहीं है वे गुजरे हुए जमाने की बातें हैं जब लोग सब भले थे नेकदिल थे एक दूसरे के सुख दुख में काम आते थे आज का जमाना तो मतलबियों का है बिना मतलब के कोई किसी से वास्ता नहीं रखता लोग रिश्तों का भी लिहाज नहीं रखते सब एक दूसरे के हकों पर डाका डाल रहे हैं। विश्वास डगमगा गया है सब एक दूसरे को संदेह की नजरों से देख रहे हैं बुरे लोगों का महिमा मंडन हो रहा है उन्हें खूब सम्मान मिल रहा है।
जो भले हैं उन्हें दबाया जा रहा है कुचला जा रहा है उनके साथ सरासर अन्याय हो रहा है उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही लेकिन जब इस पर गंभीरता से विचार करें तो बात इतनी बिगड़ी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही जैसे कोरोना काल में एक ओर जहाँ कुछ लोग लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते रहे थे कुछ ने चार पाँच गुना तक मुनाफा कमाया। दूसरी ओर अनेक भले लोग ऐसे भी थे जिन्होंने भूखों को निशुल्क भोजन कराया उन्हें कपड़े तथा दवाइयाँ दी और उनकी हर संभव मदद की आज भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मन से समाज सेवा कर रहे हैं निशुल्क भोजन करा रहे हैं गरीबों को कपड़े बाँट रहे हैं। उनका इलाज करा रहे हैं । शासन भी वंचितों को कई प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कर रहा है पशु पक्षियों के प्रति भी दया का भाव रखा जा रहा है। बुरे लोगों को देख कर जहाँ दुख होता है वहीं अच्छे लोगों को देखकर खुशी होती है कई भले लोग गरीबों की बस्ती में जाकर उनके हालचाल मालूम करते हैं और फिर उनकी हर संभव सहायता करते हैं। यह सब देखकर मन को प्रसन्नता होती है और लगता है कि अभी इंसानियत जिंदा है। और वो समय फिर से आएगा जब सब कुछ पहले जैसा बेहतर हो जाएगा। कम से कम हम यह सकारात्मक सोच तो रख ही सकते हैं।


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प्रदीप कश्यप

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