त्रेता युग में रावण एक ही था और उसने माता जानकी का हरण कर उनको अशोक वाटिका में रखा था उसके इस अपराध का दंड उसे यह मिला कि उसका कुल सहित नाश हो गया उसके वध को बुराई पर अच्छाई की जीत का दिन कहा जाता है। आज तक दशहरे पर रावण के पुतले का दहन अनेक स्थानों पर किया जाता है।
आज के इस दौर में रावणों की संख्या बहुत बढ़ गई है हर तरफ रावण ही रावण नजर आ रहे हैं कलियुग के रावणों के पापों की तो कोई गिनती नहीं है त्रेता युग के रावण के पाप तो सामने थे पर कलियुग के इन रावणों के पाप छिपे हुए रहते हैं अगर इनके पाप सारे उजागर हो जाएँ तो लोग हैरत में पढ़ जाए ये घोर से घोर पाप करने के बाद भी महान कहे जा रहे हैं इन्हें दंड देने वाले भी बेबस हो जाते हैं क्योंकि ये कोई सबूत ही नहीं छोड़ते और बरी होकर आ जाते हैं तथा फिर से बुरे काम करने लगते हैं कुछ तो ऐसे हैं जो कभी पुलिस के घेरे में नहीं आए। ऐसे लोग सफादपोश बनकर रह रहे हैं। रावण की आत्मा यह सब देखकर कितना दुखी होती होगी कि उससे कई गुना बुरे काम करने वाले उसके पुतले को जलता हुआ देखने आए हैं। और पुतला दहन के बाद बड़े खुश हो रहें हैं । ये लोग खुद के भीतर कभी झाँककर नहीं देखते न इनकी अंतर्रात्मा मा कभी कचोटती है। क्योंकि इनमें इतनी गैरत भी नहीं होती ऐसे लोग इंसानियत से दूर रहकर घोर से घोर निंदनीय काम करके खुश होते रहते हैं। शायद वो दिन भी कभी आए जब लोग दशहरे के दिन अपने भीतर की सारी बुराई को जलाकर राख कर दें। वो दिन ऐसा होगा जब दशहरा का पर्व सही अर्थ में मनाया जाएगा पर्व की सार्थकता भी तभी सिद्ध होगी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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