कुछ चालाक चतुर चपल शातिर टाइप के तिकड़म बाज लोग जिनमें प्रतिभा तो होती नहीं है फिर भी अपने इन दुर्गुणों के कारण प्रतिभाशाली लोगों के हकों पर डाका डालने में सफल हो जाते हैं और उनके स्थान को हथियाकार मान प्रतिष्ठा हासिल करने में भी सफल हो जाते हैं ळुई बार तो ये बड़े सम्मान और पुरुस्कार भी हथिया लेते हैं।
ऐसे ही एक जुगाड़ू दरबारीलाल हैं जो हिन्दी में एम ए प्रथम श्रेणी में जुगाड़ से करने के बाद जुगाड़ से ही पी एच डी करके तिकड़म भिड़ा के पहले तो प्रोफेसर बने फिर युनी वर्सिटी में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं। लगभग साहित्य के सारे सम्मान हासिल कर चुके हैं शहर की सारी साहित्यिक संस्थाओं पर उनका दब दबा है। ज्यादा पढ़ना लिखना उन्हें नहीं आता । एक नकल कराकर पैसे लेकर डिग्री दिलाने वाले व्यक्ति के माध्यम से उन्हों ने प्रथम श्रेणी में एम ए की उपाधि हथिया ली थी । इसके बाद किसी की थीसिस चुराकर पी एच डी प्राप्त कर ली इसके बाद प्रभाव तथा तिकड़म लगाकर प्रोफेसर बने और अब विश्व विद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के पद को कलंकित कर रहे हैं। वे जाने कितने फर्जियों को पी एच डी की उपाधि दिलवा चुके हैं जाने कितने प्रतिभाशालियों की थीसिस चुराकर जाने कितनों को पी एच डी की उपाधि दिलवा चुके हैं उनका सारा समय प्रतिभाओं का गला घोंटने में चला जाता है। इनकी कविताएँ चुराई हुई हैं इनकी सारी किताबे इधर इधर से चुराई सामग्री से भरी पड़ी हैं जिन पर इन्होंने सारे सम्मान हासिल किए हैं इन्होंने ही थर्ड डिवीजन से बी ए पास एक प्रतिष्ठित के रिश्तेदार करम लाल को पी एच डी की मानद उपाधि दिलवाकर साहित्य का डॉक्टर बनवा दिया है इसके बाद करमलाल को साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बना दिया गया तीन महीने में उसकी दो दर्जन किताबें छप गई जुगाड़ से से उसको भी दरबारी लाल जी ने एम ए की उपाधि दिलवा दी अब वो प्रतिभाओं का गला घोंटने और उनका शोषण करने वालों की जमात में शामिल हो गया है।
शहर के सारे साहित्यिक आयोजनों के ये मंच पर विराजमान विशिष्ट जन होते हैं बाकी कितना ही प्रतिभाशील हो वो दर्शकों की भीड़ का हिस्सा होता है। यह केवल साहित्य क्षेत्र की ही बात नहीं है हर क्षेत्र में आपको ऐसे लोग मिल जाएँगे जिनके कारण प्रतिभाएँ उभरकर सामने नहीं आती क्योंकि ये उन्हें दबा देते हैं ऐसा कर के ये अपने देश और समाज का बहुत बड़ा नुक्सान करते हैं फिर भी यह महत्वपूर्ण हैं। वी आई पी हैं सर्वाधिक प्रभाव शाली भी हैं प्रतिभाओं के पलायन कर विदेश चले जाने का सबसे बड़ा कारण ऐसे प्रतिभाहीन वी आई पी लोग हैं। जिनका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ रहा है।
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प्रदीप कश्यप
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