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व्यंग्य: पेन्शन के भरोसे

सामान्य मध्यम वर्गीय ऐसे बहुत से परिवार हैं जिनके परिवार की गुजर बसर सेवानिवृत्त दादाजी की पेंशन पर चल रही है। ऐसे रिटायर्ड कर्मचारियों के पास फंड भी नहीं बचा है जो पेंशन मिल रही है उससे बहू बेटों तथा पोते पोतियों का खर्च भी उठा रहे हैं और विवाहित बेटी की भी आर्थिक रंप से मदद कर रहे हैं । ऐसे बुजुर्ग इस बात से भी दुखी हैं कि जब वो इस दुनिया से चले जाएँगे और उनकी पेंशन मिलना बंद हो जाएगी तब इन बच्चों का क्या होगा इनकी गुजर बसर कैसे होगी बच्चे अपनी जिम्मेदारी समझ ही नहीं रहे हैं इस बात का भी उन्हें टुख है।
रामलाल जी चार साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे तब उन्हें पैंतालीस लाख रूपये फंड के मिले थे उन पैसों से उन्होंने बेटी की शादी की मकान में तीन कमरे और बनवाए बड़े लड़के की दुकान खुलवाई छोटे लड़के ने दस लाख रुपये किसी दलाल को दे दिए जिसने उसकी सरकारी नौकरी लगवाने का आश्वासन दिया था वो उसके पैसे लेकर भाग गया छोटे लड़के की सरकारी नौकरी नहीं लग सकी उसको उन्होंने एम बी ए कराया था वो बारह हजार रुपये महीने पर प्राइवेट में नौकरी कर रहा था जहाँ कार्यरत एक लड़की से उसने शादी कर ली रामलाल जी ने भी उस रिश्ते को स्वीकार कर लिया दोनों बेटे बहू वहीं उनके साथ रहने लगे बड़ा बेटा बहू ओर उनका बेटा पहले से ही रह रहा था । जब छोटी बहू गर्भवती हुई तो उसने नौकरी छोड दी उसके तीन महीने बाद ज्यादा छुट्टी लेने और ठीक से काम नहीं करने से छोटे लड़के की भी नौकरी छूट गई थी । बड़े लड़के को दुकान में जबर दस्त घाटा हुआ उधारी में पैसे डूब गया दुकान का किराया चढ़ गया और उसकी दुकान ठप हो गई आखिर उसे दुकान खाली करनी पडी रामलाल जी के पास फंड था नहीं जो उनको देकर उनका काम धंधा जमवाते। रामलाल जी को साठ हजार रुपये पेंशन मिल रही थी । जिसमें बीस बीस हजार रुपये वे दोनों बेटों को दे रहे थे जिससे उनके परिवार का खर्च चल रहा था । रामलाल जी के पास बीस हजार रुपये ही आ रहे थे उसमें से भी अधिकाँश रुपये उनकी बेटी यह कहकर हड़प लेती थी कि तुम तो बूढ़े बुढ़िया हो तुम्हारा खर्च ही क्या है । रामलाल जी जितने सीधे सरल थे उनके बच्चे उतने ही शातिर थे वे उनकी शराफत का पूरा फायदा उठा रहे थे।  
समाज में रामलाल जैसे कई बुजुर्ग मिल जाएँगे जिनकी पेंशन की राशि बहू बेटों पर खर्च हो रही है इनके बेटे उच्च शिक्षित हैं और छोटा मोटा काम कर नहीं सकते योग्यता के अनुरूप काम उन्हें मिल नहीं रहा है। वे पहले अपने पिता की तनख्वाह पर निर्भर थे और अब उनकी पेंशन पर निर्भर हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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