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अगस्त, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: हानि लाभ का गणित

हानि लाभ का गणित ऐसा है जिसका कोई सर्वमान्य सटीक फार्मुला नहीं है । कभी कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई अनुभवहीन सोता है तब वो खूब लाभ में रहता है जो और अनुभवी हो जाता है तो हानि में आ जाता है वो समझ ही नहीं पाता कि ये हानि क्यों हो रही है। लगातार घाटे से अच्छे धनवान भी दरिद्र होते देखे गए हैं। ऐसे लोग फिर भाग्य पर विश्वास करने लगते हैं । लेकिन जो समझदार होते हैं वे बुरे वक्त के खत्म होने की प्रतीक्षा करते हैं और तब तक अपना धैर्य बनाए रखते हैं क्योंकि आपत्ति काल में धैर्य ही काम आता है। जो हार नहीं मानना है जब तक हम हार को स्वीकार नहीं कर लेंगे तब तक हम हारे हुए नहीं माने जाएँगे। सफल व्यक्ति के दुश्मनों की भी कमी नहीं होती। यह लोग गलत हथकण्डे अपनाकर कभी कभी गहरी चोट दे देते हैं । इनसे बचते हुए अगर कोई सफल हो जाए तो वो सफलता स्थाई हो जाती। एक उदाहरण याद आ रहा है शहर के मध्य में ज्ञानीराम की होटल थी होटल अच्छी चल रही थी पूरा परिवार खुशहाल था। ज्ञानीराम के पास बहुत पैसे थे पर उन्हें लगता था कि होटल के व्यवसाय में कमाई तो है पर इज्जत उतनी नहीं है ऐसा उनके दोस्त भी कहते थे जिनकी बात ...

व्यंग्य: झूठी शान दिखाने के फेर में

अपनी हैसियत से बढ़कर झूठी शान दिखाने वालों की कोई कमी नहीं है लोग ऐसा कर के आर्थिक संकट से घिर जाते हैं जिससे उबारने वाला कोई इनके सामने नहीं आता यह थोथी शान बघारने वाले लोग विवाह समारोहों में अनाप शनाप खर्च करते हैं दो दिन की चमक दमक में लाखों रूपये बर्बाद करने वाले लोग अपनी वर्षों की मेहनत से कमाई दौलत को फूँक देते हैं। एक धनवान के यहाँ बेटी की शादी थी उसी मोहल्ले में एक साधारण हैसियत वाले व्यक्ति की बेटी की भी शादी थी। उसकी बराबरी करने की होड़ में उसने हैसियत से बढ़कर खर्च कर दिया। उस अमीर को तो कोई फर्क नहीं पड़ा पर शादी के बाद कर्ज की भरपाई करने के लिए इसे अपनी दो बीघा जमीन बेचना पड़ी जिससे वो किसान से मजदूर बन गया। दो दिन की चमक दमक ने उसके सारे जीवन को अंधेरे में कर दिया था। कुछ लोग हद से ज्यादा अभिमानी होते हैं वे अपने अलावा सबको हेय समझते हैं यह लोग भी शीघ्र ही बरबादी के कगार पर पहुँच जाते हैं ऐसे लोग दान धर्म में एक रुपया भी खर्च नहीं करते न कभी किसी जरूरतमंद की कोई मदद ही करते हैं परोपकार यह तभी करते हैं जब इनके अभिमान के आहत होने की संभावना प्रबल हो। वो जमाना गया ज...

व्यंग्य: महत्वाकांक्षी असफल लोग

सबसे ज्यादा दुखी वे लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षाएँ तो बहुत बड़ी हैं मगर क्षमता उतनी नहीं है ऐसे लोग जब बार बार असफल होते हैं तो और ज्यादा व्यथित हो जाते हैं ये लोग अपने आपको सबसे बड़ा समझते हैं और दूसरों को अदना। ये अक्सर दूसरों को औकात बताते हैं पर खुद की औकात भूल जाते हैं। यह अभिमानी लोग अक्सर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं या दुनिया को ही दोष देने लगते हैं पर अपनी भूल को स्वीकार नहीं करते ये पीछे हटने को तैयार नहीं होते और आगे बढ़ नहीं पाते फिर अधर में ही झूलते रहते हैं। जब यह सबसे नफ़रत करने लगते हैं तो इनसे नफ़रत करने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है फिर इन्हें कोई अपना नजर नहीं आता और फिर यह सबको दुश्मन समझने लगते हैं। वर्तमान से असंतुष्ट रहने से इन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। यह धन पद प्रतिष्ठा को ही जीवन की उपलब्धि मानते हैं। और इससे सुख तथा ख़ुशी का आँकलन करते हैं इन्हें जब कोई कुटिया में रहकर साधारण जीवन जीने वाला अलमस्त मुफ़लिस मिल जाता है तो इन्हें उसे देखकर हैरत होती है। फिर ये उसे छोटी मानसिकता वाले लोग कहकर हिकारत से देखने लगते। हैं इनकी अति महत्वाकांक्षा इन्हें चैन ...

व्यंग्य: इनका कोई क्या बिगाड़ेगा

सबसे ज्यादा दुखी और परेशान वे अधिकारी और कर्मचारी हैं जिनकी कोई पहुँच नहीं है जिनकी सत्ताधारी दल के स्थानीय लोगों से पटरी नहीं बैठ पा रही है यह काम के बोझ के तले दबे रहते हैं और उफ तक नहीं कर सकते इसके बाद भी इन्हें वरिष्ठों की डाँट फटकार सुनना पड़ती है इन्हें निलंबन का डर दिखाया जाता है वेतन वृद्धि रोकने तनख्वाह काटने या रोकने की धमकी दी जाती है और ये चुपचाप अपना काम करते रहते हैं इनकी प्रशंसा करने वाला कोई नहीं होता। डाँटने फटकारने वाला धमकी देने वाले लोग अनगिनती होते हैं। दूसरी ओर जो प्रभावशाली हैं वो मुफ्त की तनखा ले रहे हैं अधिकारियों को धमका रहे हैं किसी की कोई मजाल नहीं है जो इनका बाल भी बाँका कर सके। रतनपुर गाँव के सरकारी मिडिल स्कूल के उमेश सर उन शिक्षकों में से थे जिनका कहीं कोई सोर्स नहीं था एकदम पाॅवर लेस थे सारे स्कूल का भार उनके काँधे पर था एच एम सरपंच के भाई थे सुरेखा मेडम के पति जनपद सदस्य थे। चपरासी मुकेश पटेल का भतीजा था पटेल स्थानीत दबंग नेता थे। बाकी दो मेडम भी रुतबे वाली थी इनमें से कोई स्कूल नहीं आता था विद्यालय में मात्र बारह छात्र पढ़ते थे। ऊनमें चार ही रोज...

व्यंग्य: बराबरी न कर पाने वाले

जो बराबरी नहीं कर पाते वे जलने लगते हैं उनमें ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हो जाता जै जिसके कारण वे जलन रखने लगते हैं इन जलने वालों में अधिकतर वे होते हैं जो हमारे जाने पहचाने होते हैं कुछ ऐसे भी हैं कि जलने वालों को जलाने में उन्हें मज़ा आता हैं उसमें कुछ मजे लेते हैं वे जलने वाले जलाकर उसक आँच में अपने हाथ सेंक मज़ा उठाते हैं। इन जलने वालों पर किसी के भी उपदेश ज्ञान का कोई प्रभाव नही पड़ता यह किसी का काम बनता हुआ नहीं देख सकते जब किसी का काम बिगड़ जाता है तब इनके कलेजे को बड़ी ठंडक पड़ती है ये ख़ुशी से झूम उठते हैं। शंकर और रोहित गाँव से दूध इकठ्ठा कर सायकिल पर रखकर शहर में लाकर बेचते थे। शंकर अक्सर सोचता अगर उसकी खुद की डेरी हो तो कितना अच्छा रहे उसके पास पाँच एकड़ खेती भी थी। वो जब यह बात रोहित से कहता तो रोहित उसकी खिल्ली उड़ाता। एक दिन रोहित ने कहा तुम्हें डेरी खोलना है तो खोल लो ।मुझे कोई मतलब नहीं अपना तो यह काम ही भला इसमें कोई झंझट नहीं। शंकर ने डेरी के लिए लोन लिया जिससे डेरी बनवाई चार भैंसे और दो गाएँ खरीदीं तथा डेरी शुरू कर दी डेरी चल निकली शंकर ने पिक अप खरीद ली जिसमे...

व्यंग्य: प्रतिभाओं का गला घोटने की नाकाम कोशिश

शुरू से ही प्रतिभाओं का गला घोंटने की नाकाम कोशिश होती रही है फिर भी प्रतिभाएँ उभर कर सामने आई हैं और उन्होंने अपना लोहा मनवाया है। चलाक लोगों ने प्रतिभाओं का अवसर खत्म करने की कोशिशें की मनोबल तोड़ा गया साधन सुविधाओं में कमी कर दी गई प्रशिक्षण देने वाला कोई नहीं मिला तब भी प्रतिभाओं ने अपना लोहा मनवाया प्रतिभा उभर कर सामने आई और लोगों को उसे मान्यता देना पडी। दंसरों के खेतों में काम करने वाले मजदूर माखनलाल के तीन बेटे और एक बेटी थी उसमें एक बेटा आइ ए एस बना दूसरा बेटा आइ आइ टी से पास आउप होकर एक बड़ी कंपनी में जॉब कर रहा है जिसका मासिक वेतन पाँट लाख रुपये महीना है। तीसरा बेटा वरिष्ठ वैज्ञानिक है और बेटी डॉक्टर होते हुए सफल और प्रसिद्ध सर्जन है। दूसरी और गाँव के सबसे संपन्न और प्रभाव शाली किशनलाल के बेटे अवसर की बाहुल्यता होने के बाद भी बारहवीं से आगे की पढ़ाई तक नहीं कर सके कोई छोटी मोटी नौकरी तक उन्हें हासिल नहीं हो सकी आज एक साधारण जीवन जी रहे हैं। किशनलाल का रुतबा भी खत्म हो गया और जो खेतिहर मजदूर था वो माखनलाल आज गाँव का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति है । चालीस एकड जमीन तो उसने क...

व्यंग्य: खुद की तारीफ़ करने वाले

कुछ आत्ममुग्ध लोग खुद अपनी ही तारीफ करने में जरा भी संकोच नहीं करते ये जहाँ भी जाते हैं वहाँ अपनी तारीफ करना शुरू कर देते हैं कुछ चालाक लोग इनका लाभ उठाते हैं वे भी उनकी तारीफ करके अपना मतलब हल चर लेते हैं इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देते घंटों बोलते रहेंगे सुनने वाले को केवल हाँ में हाँ मिलाना है उनकी बात का विरोध नहीं करना है ये लोग अपनी बात खत्म करने के बाद फिर नहीं रुकते वहाँ से चल देते हैं। उनके जाते ही सुनने वाला राहत की साँस लेता है। ऐसे ही अपनी तारीफ सुनने के शौकीन अजीत जी के पास कुछ लोग आए बोले हम एक कार्यक्रम कर रहे हैं अगर आप पाँच हजार रुपये दें तो आपको हम कार्यक्रम का अध्यक्ष बना दे। यह सुनते ही उन्होंने तुरंत पाँच हजार रुपये रे दिए। कार्यक्रम के दौरान जब तक उनका गला मालाओं से नहीं भर गया तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ा। आयोजक उनकी झूठी तारीफों के पुल बाँध रहा था और वो गदगद हो रहे थे इसके बाद वो धीरे से उनके कान में बोला दादा नाश्ते के पैसे नहीं हैं दो हजार रुपये दे दें तो कार्यक्रम और अच्छा हो जाए। अपनी तारीफ से फूले हुए अजीत जी ने फौरन दो ...

व्यंग्य: मुफ्त में भौज करने वाले

एक तरफ जहाँ कई ऐसे उच्च शिक्षित हैं जो अत्यंत कम वेतन में नौकरी कर के मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं । दूसरी तरफ कुछ ऐसे चपल चालाक भी हैं जो कहीं पर भी नौकरी नहीं करने के बाद भी मजे से रह रहे हैं इनके पास रुपये पैसों की कमी भी नहीं है इनके पास आपको गरीबी रेखा वाला राशन कार्ड भी मिलेगा और एक नहीं कम से कम आठ दस इनके मुफ्त की बिजली से ऐ सी चल रहा होगा शासन की हर योजना का लाभ उठाने में वे सबसे आगे रहेंगे। ऐसे ही एक सोहनलाल हैं जिन्हें सब लोग नेताजी के नाम से जानते हैं उनके पास अपना कोई काम नहीं है। दो एकड़ जमीन का पट्टा फर्जी नाम से बनवा रखा जिसमें आज तक उन्होंने खेती नहीं की फिर भी उनके पास के सी सी है शासन की सारी सब्सिडी एवं सुविधाओं का लाभ वे लेते रहते हैं शहर का ऐसा कोई सरकारी दफ्तर नहीं है जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता हो वे अपनी जेब से कभी एक रुपया तक खर्च नहीं करते फिर भी चकाचक रहते हैं। रोज कोई न कोई उन्हें अक्ल का अंधा और गाँठ का पूरा भिल ही जाता है । जो कपन में भी दलाली खा लें उसमें के हैं वो फिर भी बस्ती के लोगों का उनके बिना कोई काम नहीं चलता है किसी को अस्पताल ले जान...

व्यंग्य: प्रतिभाओं का अनुचित दोहन करने वाले

एक वो दौर भी था जब लोग कला पारखी होते थे प्रतिभाओं का सम्मान किया जाता था कलाकार को फनका को मान सम्मान के साथ ही अच्छा पारिश्रमिक भी मिलता था और एक यह दौर भी है जब कई अच्छी प्रतिभाएँ अवसर की कमी के कारण घुट रही हैं या उनका अनुचित दोहन किया जा रहा है। और जो दोहन कर रहे हैं वो उनका मान सम्मान तो दूर की बात उनको प्रति असंवेदन शील रुख अपना रहे हैं। केदार बाबू अच्छे पैंटर थे विभाग में कोई बड़ा कार्यक्रम था बड़े साहब उसकी रूपरेखा बनाने में व्यस्त थे मंच को डेकोरेट करना था कुछ बोर्ड बनवाने थे कुछ चित्र पेन्ट कराने थे । जिस पेंटर से बात की उसने बहुत सारे रुपये माँगे जो साहब के बजट से बाहर था। फिर यह भी कहा कि समय कम है और तय समय?में काम पूरा नहीं कर पाऊँगा तभी किसी ने साहब से कह दिया कि अपने केदार बाबू हैं न वो अच्छे पेन्टर हैं उनकी ड्यूटी लगा दो कुछ पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे और काम भी चोखा हो जाएगा । केदार बाबू काम में डूबे हौए थे तभी चपरासी ने कहा आपको बढ़े साहब याद कर रहे हैं । चेदार बाबं तुरंत बड़े साहब के पास गए बड़े साहब को पद का बड़ा अभिमान था उन्होंने सीधे आदेशात्मक लहजे में कहा आपकी...

व्यंग्य: दूसरों की दम पर शेर बनने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अकेले और अनजान जगह पर हों तो डरे सहमे भीगी बिल्ली की तरह नजर?आते हैंऔर वही जब जान पहचान वालों के बीच में हों तो शेर दिल बन जाते हैं यह लोग कभी अपनों को बडी परेशानी में डाल देते हैं। फिर भी उन्हें अपने किए पर कभी अफसोस नहीं होता और फिर मौका मिलने पर दुबारा वही हरकत करने से बाज नहीं आते। इसी तरह के एक व्यक्ति थे राकेश वे एक बार अपने चार परिछितों के साथ कहीं गए थे। उनकी दम पर वे शेर बन चुके थे और हर किसी से झगड़ा मोल ले रहे थे साथ वाले उनसे परेशान हो गए थे किसी तरह समझा बुझाकर साथ वाले झगड़ा टाल रहे थे पर एक जगह तो अति हो गई जब राकेश ने बिना किसी बात पर एक युवक पर थप्पड जड़ दिया यह देखकर वे चारों सकते में आ गए इसके बाद भी राकेश के तेवर नरम नहीं हुए। वो युवक स्थानीय था । थोड़ी देर में अपने पचास साथियों को लेकर आ गया उन चारों ने राकेश को कहीं छिपा दिया वे तो यह कह कर चले गए कि कहीं तो मिलेगा कभी तो मिलेगा थप्पड़ का बदला तो निकाल कर रहेंगे और दूसरे ही दिन ऐसा हुआ कि वे बस में बैठकर किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे थे खिड़की पर बैठे हुए थे उस युवक ने उन्हें पहचान लि...

व्यंग्य: तब की बात और थी

आज के इस दौर की तुलना जब पुराने लोग अपने दौर से करते हैं तो उन्हें बहुत हैरत होती है । फिर वे इस दौर की बुराई करने लगते हैं जो आज के लोगों को अच्छी नहीं लगती कुणाल के दादाजी कह रहे थे हम जब डॉक्टर को दिखाते थे तो उनकी फीस दस रुपये थी और पाँच रुपये में दवाएँ आ जाती थीं कल पत्नी को दिखाया था पूरे आठ हजार रुपये अस्पताल में ही खर्च हो गए जबकि चार हजार की दवाएँ आईं। हमने अपने एक परिचित आर एम पी को बताया तो वे बोले इसमें आठ सौ रुपये की दवाएँ ही काम की हैं बाकी सब फालतू की हैं थोक में इन द वाओं की कीमत मात्र अस्सी रुपये है। वे बोले जबकि डॉक्टर ने अपनी फीस के दो हजार रुपये ले लिए छृ हजार रुपये जाँच के नाम पर वसूल कर लिए जबकि पत्नी को कोई बीमारी नहीं थी सिर्फ थोड़े चक्कर आ रहे थे वो भी बिना दवा खाए ही ठीक हो गए थे।  यह सुनकर नितिन के दादाजी बोले बहू का अटेच मेंनूट करायेहा था जिसमें पूरे चालीस हजार रुपये खर्च हो गए। तबादला कराने के दो लाख रुपये लग रहे थे । जबकि हमारे जमाने में हमारा अटेट मेन्ट ए डी आई एस ने बिना कुछ लिए दिए ही करा दिया था और फिर हमारा तबादला हमारे मित्र ने भी बात...

व्यंग्य: अपने ही जाल में फँसे हुए

एक कहावत है कि जो दूसरों के लिए गढ्ढा खोदता है वो एक दिन खुद उस में गिरता है । अपनी गलतियों की जब हमें सजा मिलती है तो इसका दोषी हम दूसरों को नहीं ठहरा सकते। जो दूसरों को परेशान करने के लिए नियम बनाते हैं वे खुद उनकी ही परेशानी का कारण बन जाते हैं।  सबसे बड़ी गुलामी होती है वैचारिक गुलामी या थोथे संकल्प या अभिमान में चूर होकर किए गऐ प्रण। एक ने प्रण कर लिया कि वो कल पूरे दिन अन्न जल ग्रहण नहीं करेगा मौन व्रत रखेगा तथा आसन पर न तो बैठेगा न शैया पर आराम करेगा। लोगों ने उसके प्रण सुनकर खूब ताली बजाई और उसकी खूब तारीफ की दूसरे दिन उसके पास दस लोग सुब्ह से ही आ गए। उन्होंने उसे एक पल के लिए भी ओझल नहीं होने दिया। दोपहर तक तो जैसे तैसे उसकी हालत ठीक रही दोपहर बाद वो भूख और प्यास से बेहाल हो गया। जब उसका व्रत पूरा हु आ तब वो बेहोश हो गया था। लोगों ने उसे निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया जहाँ वो तीन दिन रहा जिसका बिल सत्तर हजार रुपये आया जो उसने कर्ज लेकर अदा किया दस दिन रुपया कमाने नहीं जा सका पूरे एक लाछ की चपत लगा बैठा उसका अन्न जल त्याग कर मौन व्रत का प्रण। ये प्रण उसने स्वये क...

बनी को बिगाड़ने वाले (व्यंग्य)

कोई व्यक्ति गरीबी से जब ऊपर उठता है तब उसे ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगाना पड़ता है। बनने में देर लगती जब बिगड़ने में जरा भी देर नहीं लगती। बराबरी करने वाले बहुत कम होते हैं और किसी की बढ़ती देखकर जलने वाले बहुत मिल जाएँगे। उनमें अधिकतर तो हमारे आसपास के हमारे अपने ही करीबी होते हैं। जो कोई संपन्न होता है तो उसके दोस्त हजार होते हैं और जब वो बर्बाद होता है तो अपने वाले भी उस से मुँह फेर लेते हैं। किसी ने ऐसे लोग भी देखे होंगे जो कभी जब धन संपन्न थे तब उनके यहाँ मेहमानों का ताँता लगा रहता था। हर महीने एक बोरा शकर आती थी जो सिर्फ चाय बनाने में ही खर्च हो जाती थी और जब वो बर्बाद हो गए तो उनकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं रहा। अब उनकी ये हालत हो गई कि दुकानदार भी उन्हें आधा किलो शकर उधार देने को राजी नहीं होता था। जो कभी एक बोरा शकर उनके नौकर के कहने पर भिजवा देता था और महीनों पैसे की बात नहीं करता था और जब वे पैसे देते तो कहता था घर की तो बात है इतनी जल्दी क्या है। पैसे कहा क्या है वो तो कभी भी आ जाएँगे। आज वही आधा किलो शकर तक उधार देने को तैयार नहीं है। ऐसे ही एक गाँव के पटेल हरिसिंह थे। ...

व्यंग्य: आस्तीन के साँप

कुछ कथित मित्र आस्तीन की साँप की तरह होतेहैं जो अपने मौँह में विष लिए आपके साथ रहते हैं और आपकी मिटाने की ताक में रहते हैं ये लोग नफैरत और दुश्भनी को इतनी गहराई में छिपा रखते हैं कि उसकी खबर किसी को भी नहीं लग फाती जब यह अपनी कसर निकाल लेते ऐं तब इनका पता चलता है तब तक इतनी देर सै चौकी होती है ।कि सँभलने का भी वक्त नहीं मिलता है। लाड़सिंह और रेशमलाल दोनों मित्र हैं । एक बार लाड़सिंह ने रेशमलाल से अपने मतलब लिए चोई बुरा काम चराना था यह करने से रेशमलाल ने साफ इंकार कर दिया। इस की गाँठ लाड़सिंह ने बाँध कर रख ली। उसने रेशमलाल से खुलकर दुश्मनी नहीं की ऊपर ऊपर दोस्ती का दिखावा करता रहा और भीतर दुश्मनी को छिपाए रहा जब तक उसने अपना बदला नहीं निकाल लिये तब तक उसने चैन नहीं लिया। यह मतलब के यार खाने में सबसे आगे रहते हैं और खिलाने का मौका आए तो पीछे हप जाते हैं यह खुद तो ऊपर नहीं पहौँच पाते लेकिन आपकी सीढी खींचने में उन्हें भरपूर मजा आता है। वे तो ऊँचाई पर कभी पहौँट नहीं सकते पर आपको भी पहौँचने नहीं देती चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी हद गिरना ही क्यों न पड़े। हम समाज में रहते हैं न तो हम...

व्यंग्य: निठल्ले

ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जो कोई काम नहीं करते कहीं से एक रुपया भी नहीं कमाते और सो दो सो रुपये रोज खर्च करने के बाद भी अलमस्त बनकर रहते हैं । दूसरी ओर ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें अपने काम से कभी फुर्सत ही नहीं भिलती ऐसे लोग पैसा कमाने की मशीन बनकर रह जाते हैं काम में और काम के तनाव में रहते हुए अपना सारा समय गुजार देते हैं। कुठ लोगों में ये गलतफहमी होती है कि उनके बिना कोई काम होगा ही नही ये लोग अपने को सबसे अधिक योग्य समझते हैं। यह भी जिंदगी जीने का लुत्फ नहीं उठा पाते। शहर से दस किलोमीटर दूर स्थित गाँव रतन खेड़ी के जीवन दादा की उम्र चालीस वर्ष की हो गई थी। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई काम नहीं किया था। उनके पास बीस एकड़ सिंचित जमीन थी। पहले उनके पिताजी खेती करते थे फिर पिताजी के बाद उनकी माँ और पत्नी ने खेती का काम सम्हाल लिया अब उनका लड़का रोहित अठारह साल का हो गया था और उसने खेती के काम में हाथ बँटाना शुरं चर दिया था। जीवन दादा का रोज की दिनचर्या ऐसी थी की सुब्ह वे नित्य नियम पंरे कर ठीक साढ़े नौ बजे खाना छाकर तथा पाँच सौ रुपये लेकर अपनी भोटर सायकिल से शहर आ जाते थे...

व्यंग्य: चंदे का धंधा

चंरे का धंधा ऐसा है जिसका सीजन कभी खत्म नहीं होता साल के पूरे दिन आयोजन के अवसर मिलते रहते हैथ उनमें से अधिकाँश आयोजन चंदे की राशि से ही संपन्न होते हैं यह बात उनकी नहीं है जो चंदा लेकर उसे ईमानदारी से सही जगह पर खर्च करते हैं यह तो उनके लिए है जिनका किसी भी प्रकार के आयोजन से कोई लेना देना नहीं होता। ऐसे ही शहर में एक बड़ा और भव्य आयोजन हो रहा था जिसमें लगभग अस्सी लाख रुपये खर्च हुए थे सारा आयोजन चंदे की दम पर हुआ ।वहीं हमारी बात एक चंदाखोर आदमी राकेश से हुई उससे हमने कहा इसके आयोजक ईमानदार प्रतीत होते हैं । तभी तो इतना भव्य आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हो सका। हमारी बात सुनकर राकेश कुटिलता से मुस्कुराया फिर बोला इसमें मैंने पूरे आठ लाख रुपये दबाए हैं हमने कहा कैसे वे बोले जब इस आयोजन की रूपरेछा बन रही थी उस समय मैं भी सक्रिय था ।जो रसीद कट्टे आए थे उसमें हेराफेरी करके मैंने एक कट्टा फर्जी प्रेस से ही उड़ा लिया था चंदा वसूलने की जिम्मेदारी मुझे भी सौंपी गई थी तो मैंने जो समिति का रसीद कट्टा था उसमें कम चंदा देने वाले की रसीद काटी और जिन्होंने ज्याद धनराशि दी उन्हें फर्जी रसीद दी रस...

व्यंग्य: अपना बनाकर मीठा जहर देने वाले

कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो बातें तो सबके भले की कहेंगे खूब अपनापन भी जताएँगे। मगर दिल से कभी नहीं स्वीकारेंगे ये वो लोग हैं जो अपना बनाकर दवा के नाम धीमे धीमे मीठा जहर देते हैं जब तक कोई इनकी फितरत समझ पाता है तब तक ये अपना काम कर चुके होते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण नरेश का है जो बारह हज़ार रुपये में एक जगह पर?कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी कर रहा था। उसे शहर के ऐक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी जिनका शहर में बड़ा नाम था सोहन जी । उन्होंने उसे अपनी बातों के जाल में फँसाना शुरू किया। नरेश उनसे प्रभावित तो था ही सो उनकी बातों में आ गया उन्होंने उसे सरकारी नौकरी दिलाने का पक्का वादा करके उसकी नौकरी छुड़वा कर अपने यहाँ रख लिया उससे कहा पंद्रह दिन में नौकरी लगवा दूँगा तब तक हमारे यहाँ काम करो। नरेश उनके यहाँ मुफ्त में काम करता रहा और वे चिपुड़ी बातें करके भरमाते रहे ऐसा करते करते पूरे दो महीने हो गए उसे वेतन के नाम पर एक रुपया भी नहीं दिया गया था आज कल कहकर टरकाया जा रहा था। एक दिन नरेश ने उनसे कहा कि एक सरकारी विभाग में संविदा पर कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी है मैं वहाँ आवेदन दे आया हूँ अगर आप...

व्यंग्य : हमेशा फुरसत में रहने वाले

समाज में कुछ लोगों ऐसे भी मिल जाएँगे जो हमेशा फुरसत में रहते हैं और कहीं पर भी किसी के साथ चले जाते हैं यह समाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। घर पर इनसे कोई कुछ कहने वाला नहीं होता। न इन्हें घर गृहस्थी की कोई चिंता रहती है । किसी के साथ मेहमानी करने चले गए और दस दिन बाद भी आए तो भी इनके परिजनों की इनकी चिंता नहीं रहती। इन्हें अपने भोजन पानी की भी चिंता नहीं रहती कहीं से भी इन्हें खाना मिल ही जाता है। यह फुरसत में रहने वाले लोग ऐसे ही नहीं बन गए । किसी को काम करना अच्छा नहीं लगा। किसी को नौकरी रास नहीं आई किसी के परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत है। उनके पिताजी सारा काम सम्हाले हुए हैं और उनके पास फुर्सत ही फुरसत है।   ऐसे ही शहर के एक फुरसतिया हैं जिनका नाम सौरभ है उनकी उम्र पैंतीस साल की हो गई शादी हो गई दो बच्चे भी हो गए । लेकिन सौरभ ने आज तक एक रुपया भी कमाकर घर में नहीं दिया फिर भी उनके परिजनों को सौरभ से कोई शिकायत कभी नहीं रही। सौरभ की पत्नी नौकरी कर रही थी। मकान किराये से दे रखा था जिससे हर महीने तीस हजार रुपये की कमाई हो रही यह कोई छोटी रकम है। इसलिए सौ...

व्यंग्य: बुरे लोगों की मिठास

बुरे लोग अग हमसे खिंचे से रहे हमसे कोई वास्ता नहीं रखें तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं हो सकती लेकिन जब बुरे लोग हमसे अपनापन बताने लगे चिकनी चिपड़ी बात करने लगे तो उनके ऐसे कामों से कोई ख़ुशी नहीं होती बल्कि मन सोच में पड़ जाता है कि इसके भीतर कौन सी खोट छिपी हुई है आखिर हमसे ये क्या चाहता है इसने जीवन में कभी किसी का भला तो किया नहीं तो हमारा क्या करेगा। यह बात उन लोगों पर लागू होती है। जिन्हें भले बुरे की अच्छी पहचान होती है। जो इनसे धोखा खा के बैठे होते हैं। जो लोग इनको समझ नहीं पाते वो इनके दंश के शिकार होकर अपना बहुत कुछ खो चुके होते हैं। ये बुरे लोग अपना काम निकाल कर ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग मतलब निकलने के बाद ये आपसे वास्ता पूरी तरह खत्म कर लेते हैं आपको देखकर कन्नी काट लेते हैं।  ऐसे ही हमारे एक परिचित रोहित जी से बात हुई जो बड़े पीड़ित आहत और दुखी दिखाई दे रहे थे। हमने उनसे जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने मंच पर बैठे एक नेतानुमा व्यक्ति की तरफ इशारा किया जिसका नाम राकेश था । बोले मेरी परेशानी का कारण मंच पर बैठा हुआ ये आदमी है। यह मुझसे मेरा मनचाहे ...

व्यंग्य: झूठी सहानुभूति दिखाने वाले

किसी के दुख में शामिल होकर संवेदना व्यक्त करना एक अच्छे इंसान के स्वभाव का हिस्स होता है लेकिन उन लोगों को हम क्या कहेंगे जो किसी को दुखी देखकर खुश होते हैं और सुखी देखकर चिढ़े रहते हैं ऐसे लोग किसी के दुख में जब शामिल होने जाते हैं तो खुशी को भीतर छिपा लेते हैं और अपनी क्रूरता का कोमल रूप दिखाते हुए झूठी सहानुभूति दिखाते हैं । और जब वह उन्हें अपना समझकर अपने मन की बात बताता है तो इन्हें भीतर ही भीतर बहुत मज़ा आता है और उपर से उनके सगे बनकर उस पर सहानुभूति का मल्हम लगाते हैं पर वो मल्हम नहीं होता वो एक तेजाब की तरह होता है जो उनकी पीड़ा को कई गुना बढ़ा देता है। ये झूठी सहानुभूति दिखाने वाले लोग मौके का फायदा उठाकर अगले से वे सब बातें उगलवा लेते हैं। जो वो छिपाकर रखना चाहता था। ऐसे ही एक थे अनोखी लाल वे अपने परिचित रवि के यहाँ संवेदना व्यक्त करने गए अनिल का दूसरा बेटा जो अभी एक साल का भी नहीं हुआ था । उसका निधन हो गया था। अनोखी इस से मन ही मन खुश हो रहे थे क्योंकि जब रवि के यहाँ दूसरे बेटे का जन्म हुआ था तब यह ईर्ष्या के कारण अकेले में फूट फूट कर रोये थे। उनके यहाँ पाँच लड़किया थी...

व्यंग्य: सुख के साथी

कहते हैं जब किसी का बुरा वक़्त आता है तो उसका साया भी उसका साथ छोढ़ देता है बिगड़े हुए का कोई नहीं होता और अगर कोई अपनी मेहनत और लगन से संघर्ष कर के सफल हो जाए और सुख से रहने लग जाए तो उसके पास मुफ़्त खोरों की भीड़ ऐसे इकठ्ठी होने लगती है जैसे गुढ़ की ढेली पर मक्खियों का झुंड टूट पड़ता है।  जब कोई जीने के लिए संघर्ष कर रहा होता है और अगर वो स्वाभिमानी तथा खुद्दार हो तब उसके साथ कोई नहीं होता अपने भी कन्नी काटकर निकल जाते हैं वो किसी अपने को रोक कर कुछ बात करना चाहे तोउसकी बात कोई सुनने को तैयार नहीं होता उन्हें ये ही डर लगा रहता है कि कहीं ये हमसे पैसा न माँग ले। हाँलाकि भले इंसानों की भी कोई कमी नहीं है दुनिया में। जरूरतमंद की मदद करने में बहुत लोग आगे रहते हैं। पर उनमें से कोई अपने वावा नहीं होता न कोई रिश्तेदार आगे आता है। इसके बाद अगर जीना है तो उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।  दिनेश को दो लाख का लोन चाहिए था इसके लिए उसे जमानतदार की जरूरत थी । दिनेश को अपने पक्के दोस्त केशव की याद आई उसने जब केशव से संपर्क किया तो केशव ने जमानत देने से साफ इंकार कर दिया जबकि दिनेश के...

सफलता का नशा (व्यंग्य)

सफलता पाने के लिए लोग कितना संघर्ष करते हैं ऐड़ी चोटी तक का जोर लगा देते हैं। जब ये लोग संघर्ष कर रहे होते हैं तो बड़े निरीह और मासूम नज़र आते हैं। इतने मासूम कि किसी को भी देख कर तरस आ जाए और यही जब सफल हो जाते हैं तो इनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो पेड़ फल से लदा होता है वो झुक जाता है। पर सफलता पाने के अहं में चूर हुए लोग खजूर के पेड़ की तरह हो जाते हैं। जिसके हर पत्ते में काँटे होते हैं जिसकी छाया घनी नहीं होती और कोई उसकी छाया के नीचे नहीं बैठता क्योंकि उसे डर रहता है काँटो से भरे पत्तों का समूह अगर उस पर गिर गया तो वो ज़ख्मी भी हो सकता है। कहते हैं सफलता का नशा सर चढ़कर बोलता है। ऐसा अभिमानी इंसान सभी को तुच्छ समझने लगता है और अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और उसकी यही सोच उसके लिए घातक सिद्ध होती है। कुछ लोग सफल होने के बाद उनसे भी वास्ता ख़त्म कर लेते हैं जिनका उनकी सफलता में बड़ा योगदान रहता है। कहते हैं सफलता के शिखर पर कोई अधिक देर नहीं ठहर सकता फिर जब उनका पतन होता है तो उनकी खोजखबर लेने कोई नहीं पहुँचता ऐसे लोग गहरी खाई में गिरकर ग...

व्यंग्य: खुन्नस खाए हुए

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दुश्मनी को बहुत गहराई में छिपाकर रखते हैं ऊपर ही ऊपरी गहरे दोस्त बनने का दिखावा करते हैं ये खुन्नस खाए हुए लोग उस बह़े से बड़े दुश्भन से भी अधिक खतरनाक होते हैं जो खुलकर दुश्मनी करता है कभी ऐसा भी होता है कि ये खुन्नस खाए हुए लोग बार बार मुँह की खाते हैं फिर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते आपने ऐसे कई लोग देखे होंगे जो दूसरों को मिटाने में खुद पूरी तरह मिट गए पर उसका बाल बाँका भी नहीं कर पाए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अकारण ही खुन्नस खाए रहते हैं। जबकि संबंधित का उनसे कुछ लेना देना नहीं होता तब भी वे नुक्सान पहुँचाने की ताक में रहते हैं और हर बार असफल होने के बाद भी चुप नहीं बैठते। ऐसे ही एक विकास कॉलोनी में महेश वर्मा जी रहते थे । उनसे उनके एक परिचित सुरेश जी ने कहा कि आपके पड़ोसी मुकेश जी से आपकी लड़ाई चल रही है क्या वे बोले नहीं तो। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं । तब उन्होने कहा वे आपकी खूब बुराई करते हैं दिन रात आपको बद्द्आएँ देते हैं। इस पर महेश जी बोले हमारी उनकी तो खूब बातचीत होती है। ऐसा तो नहीं लगता। महैश जी ने इसके बाद भी मुकेश जी से झगड़ा नहीं किया। म...

व्यंग्य: कम पढ़े लिखो के मजे

कुछ चपल चालाक लोग जो ज्यादा पड़े लिखे नहीं है पर किसी भी तरह से कामयाब हो गए हैं । वे पढ़े लिखों से ज्यादा मजे से रह रहे हैं और अक्सर पढ़े लिखे लोगों की खिल्ली उड़ाये दिखाई देते हैं। ये लोग अगर नेता बन जाएँ तो फिर इनके तेवर ही बदल जाते हैं। हाँलाकि पढ़ाई लिखाई के महत्व को नहीं नकारा जा सकता पर ऐसे लोगों का क्या करे। जगमोहन जी की कपड़े की बड़ी दुकान थी उनको ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं आती थी लेकिन हर महीने उन्हें दस लाख रुपये का लाभ होता है। उनकी दुकान पर एक एकाउण्ट का काम करता है वो एम कॉम प्रथम श्रेणी से पास है। वे उसे बाइस हज़ार रुपये महीने वेतन देते हैं और उसकी पढाई लिखाई की खिल्ली उड़ाते रहते हैं जबकि वो दुकान का पूरा हिसाब किताब देख रहा था। ऐसे ही धीरज पाँचवी से आगे की पढ़ाई न कर सका तो नेता बन गया। चुनाव जीत कर गाँव का सरपंच भी बन गया। दूसरी उसी गाँव का रतनलाल जो उनके साथ पढ़ा था। वो बी ए पास करने के बाद भी स्कूल में चपरासी था। धीरज जब भी स्कूल आता तब ही रतनलाल को नीचा दिखाता रहता था। रतनलाल कोई जवाब नहीं दे पाता था। धीरज की स्कूल में खूब खातिरदारी होती थी। और रतनलाल ...

व्यंग्य: अपनों की दगाबाजी

जिन अपनों को इंसान अपना आधार समझता है वे ही अगर दगाबाजी करने लगें तो इंसान भीतर ही भीतर टूट जाते हैं इन अपनों की दगाबाजी ने मज़बूत रिश्तों की नींव भी खिसका दी है बच्चे बड़े होकर माँ बाप को धोखा दे रहे हैं। पति पत्नी को धोखा दे रहा है पत्नी पति को धोखा दे रही है ।दोस्त दोस्त को दगा दे रहे हैं जो सहकर्मी है वो भी अपना नहीं है। ऐसे में समाज से नैतिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। ऐसी बात भी नहीं है कि पूरा समाज ही बिगड़ गया है पर जितना बिगड़ा है वो भी कम चिंता की बात नहीं है। आए दिन ऐसी कई घटनाएँ हमारे सामने घटती रहती हैं जो हमें सोचने पर मज़बूर कर देती हैं। ऐसी ही एक बात है असीम घर का बड़ा बैटा था । माँ बाप उसके छोटे भाई प्रखर से ज्यादा लगाव रखते थे उसकी हर जिद पूरी करते थे । जबकि असीम को उन्होंने उपेक्षित कर रखा था। इसके कारण प्रखर बिगड़ गया था। असीम को छोटी जरूरतों के लिए भी तरसाया जाता था। उसका जन्मदिन कभी नहीं मनाया जाता था जबकि प्रखर का जन्म दिन खूब धूमधाम के साथ मनाया जाता था। असीम थोड़ा बड़ा हुआ तो जल्दी ही आत्म निर्भर हो गया अब माता पिता उससे कहने लगे कि वो पूरी कमाई उन्हें ...

व्यंग्य: निंदा करने वाले

अपनी प्रशसा किसे अच्छी नसीं लगती कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जब कोई उनकी प्रशंसा नहीं करता तो वे खुद अपनी ही प्रशंसा करने लगते हैं ऐसे लोगों का फायदा वे मतलबी लोग उठा लेते हैं जो उनकी झूठी प्रशंसा करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वभाव से निंदा करने वाले होते हैं ये कभी किसी की तारीफ नहीं करते। और जब तक वे निंदा करने का कोई बिंदु नहीं तलाश लेते तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता जैसे ही उन्हें निंदा करने की वजह मिल जाती है वैसे ही वे निंदा करना शुरू कर देते हैं और ख़ूब जी भर के निंदा करते हैं। तब कहीं इनकी आत्मा को शाँति मिलती है । वो दिन बीत गए जब लोग निंदा करने वाले को अपने साथ रखते थे और उसकी किसी बात का बुरा नहीं मानते थे। तथा उसकी निंदा सुनकर अपने में सुधार करते थे वो दौर उच्च गुणवत्ता का था। लोगों के जीवन मूल्य भी उच्च कोटि के थे। आज का दौर तो वो दौर है जिसमें लोग पैसे देकर अपने प्रशंसकों की फौज खड़ी कर देते हैं जो घटिया घटिया चीज को भी स्टेण्डर्ड बना देते हैं खोटे सिक्के खरे को चलन से बाहर कर देते हैं। और खरा सिक्का मूल्यहीन होकर परे कर दिया जा...

व्यंग्य : ज़रा सी खोट

ज़रा सी खोट खरे को पूरी तरह खरा नहीं रहने देती और कभी कभी इसके बहुत बुरे परिणाम आते हैं जो जीवन भर शराफ़त करता रहा वो अगर कभी जरा सा बुरा कर दे तो उसकी शराफ़त पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। जो यह कहते हैं कि कुछ नहीं होने वाला कौन देखने वाला है सब चलता है ।आजकल शराफ़त का जमाना नहीं है। कोरी तनख्वाह में क्या होता है थोड़ी ऊपर की कभाई भी होना चाहिए। ऐसे लोगों की बातें बड़ी मीठी और लुभावनी होती हैं और लोग इनकी बातों में आकर अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं। यही अंजाम डॉ विमल प्रसाद जी का अंजाम हुआ वो शहर में फिजिक्स के अच्छे प्रोफेसर के नाम से जाने जाते थे। आजकल नौकरी से हाथ धोकर जेल की हवा खा रहे हैं सिर्फ एक जरा सी खोट ने उनको इस मोड़ पर ला दिया था । बात तब की है जब उन्होंने दसवीं बोर्ड की परीक्षा पास की थी उसमें उनके उन्सठ प्रतिशत अंक आए थे। वे मॉडल हायर सेकेण्डरी स्कूल में हायर मेथ से पढाई करना चाहते थे और सत्तर पर सेन्ट से कम अंक वालों को कॉमर्स दिया जा रहा था। उन्होंने दसवी रिपीट करने का मन बना लिया था तभी किसी ने उनकी एक फर्जी चतुर चालाक आदमीं से बात करा दी उसने एक लाख रुपये लेकर...

व्यंग्य: मुफ्त के मज़े

हर शहर में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने पास से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं करते फिर भी जिंदगी के पूरे मजे लेते हैं यह मुफ्तखोर ऐसे रईस के बेटे से दोस्ती कर लेते हैं जो बिगड़ा हो अगर बिगड़ा हुआ न भी हो तो भी ये उसे बिगाड़ देते हैं फिर उससे अपना मतलब निकालते रहते हैं। जब यह देख लेते हैं कि अब इस तिली में तेल नहीं है तो उसका साथ छोड़ने में एक पल की भी देर नहीं लगाते। ऐसे ही एक व्यक्ति था ओम प्रकाश जिसके पिताजी के पास पूरे बावन एकड़ जमीन थी। उसकी पूरे गाँव में इज्जत थी। लेकिन ओम प्रकाश उनकी बिल्कुल भी इज्जत नहीथ करता था उसे अपने पिताजी की हर बात बुरी लगती थी। वो खेती के काम में बिल्कुल हाथ नहीं बँटाता था। पिताजी ने उसकी शादी कर दी तब भी उसमें सुधार नहीं आया। वो पिताजी से कहता क्या रखा है खेती करने में सारी जमीन बेच दो और मजे करो। फिर वो नई नई स्कीम लेकर आता और कहता इसमें पैसा लगाओ फिर देखो कैसे पैसों की बरसात होती है। उसने जिन मित्रों को अपना समझ रखा था वे उससे मतलब की दोस्ती रखते थे। वो उन पर पैसे खर्च करता था इसलिए वे उसके साथ रहते थे। ओम प्रकाश की दशा जब बिगड़ी जब उसके पिताजी ...

व्यंग्य: ऊँची पहुँच वाले

कुछ चपल चालाक किस्म के लोग किसी तरह से बड़े लोगों से संपर्क बनाकर दूसरों पर अपना रौब गाँठते हैं और अनुचित रूप से अच्छा खासा धन भी कमा लेते हैं । ऐसे ही गाँव के तिकज़मढाज नेता कम दलाल ने गाँव के स्थानीय शिक्षक का का प्रशासनिक रूप से तबादला करा दिया और बाद में एक लाख रुपये लेकर रुकवा भी दिया । ये लोग हद दर्जे के बेशर्म होते हैं मान अपमान की इनको परवाह नहीं होती ये तो बस अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। जिससे उन्हें मोटा लाभ होता है और दबदबा भी कायम रहता है। ऐसे ही गाँव के किशन दादा है पाँचवी तक पढ़ने के बाद वे कुछ दिन तक आवारा घूमते रहे फिर चुनाव में नेताजी के समर्थक बन गए नेताजी के चुनाव जीतने के बाद किशन दादा की तो मानो लाटरी खुल गई देखते देखते उनका स्तर बदल गया । नई मोटर सायकिल ले ली किशन दादा का रोज का यही काम था सुब्ह आठ बजे घर से निकल जाते थे और रात के दस बजे के पहले कभी वापस नहीं आते थे। सारे ऑफिसों में उनकी सेटिंग थी पैसे लेकर काम कराते थे पैसे देने वाला काम होने पर उनका अहसान मानता था किशन दादा ने अपने जीवन में कभी एक धेला भी नहीं कमाया फिर भी उनका गाँव में सबसे आलीश...

व्यंग्य: बेदिल बेईमान

अक्सर देखा जाता है कि जो लोग बेईमान भ्रष्ट रिश्वत खोर होते हैं वे बेदिल होते हैं उनमें न तो रहम होता है और न ही इंसानियत। भावना शून्य होते हैं ऐसे लोग इन्हें सिर्फ अपना मतलब दिखाई देता है ये लोग समाज में अनैतिकता को बढ़ावा देते हैं। एक सरकारी कमाऊ विभाग में कार्यर थे सोहन बाबू ऊपर की आमदानी बहुत थी। पाँच हजार रुपये किलो की मिठाई खाते थे पर किसी ने कभी उन्हें एक रुपया किसी लाचार गरीब असहाय को दान करते हुए नहीं देखा था ऊपर की कमाई के पैसे वे ऊँची ब्याज दर पर कर्ज देने में चलाते थे और गरीब दुखी बेबस फटेहाल लोगों से बेरहमी से ब्याज की रकम वसूल करते थे इन्हें किसी का कोई डर नहीं था जो अधिकार थे उनका दुरूपयोग कर रहे थे। ऐसे बेईमान लोग अपने साथ काम करने वालों को भी नहीं छोड़ते थे। एक विभाग में ईमानदार कर्मचारी मोहन बाबू कार्यरत थे। सीधे सादे सरल इंसान थे । साहब ने उन्हें लूप होल में डाल रखा था। उनके पिताजी बूढ़े थे । उनकी बीमारी के इलाज का बिल बारह लाख रुपये था। उन्होंने उसके भुगतान का क्लेम किया था वो बिल काट छाँट के चार लाख का कर दिया गया फिर उसको पास करने के लिए उनसे चालीस हज़ार...