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व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं जितना सुख पद पर बने रहने पर प्राप्त होता है उससे कई गुना दुख पद छूट जाने के बाद भूतपूर्व होने पर होता है कई लोग तो इस स्थिति को सह नहीं पाते और उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है यही हाल उच्च अधिकारी के पद से रिटायर हुए राजेश वर्मा का था आज सुब्ह उनकी पत्नी ने उन्हें बुरी तरह लताड़ दिया था पहले तो उसने उनसे कहा अब आपके पास कोई काम तो है नहीं ऐसा करो बाजार से सब्जियाँ खरीद कर ले आओ बेचार सब्जियाँ खरीद कर लाए तो पत्नी झल्ला पड़ी तुम्हें सब्जियाँ खरीदना भी नहीं आता पता नहीं कैसे इतने बडे अधिकारी का पद सम्हालते होंगे बेचारे अपना सा मौँह लेचर रह गए पद के छिनते ही गाड़ी बँग्ला नौकर चाकर सब हट गए थे वेतन की आधी पेंशन मिल रही थी ऊपर की कमाई पूरी तरह बंद हो गई थी किसी को डाँट फटकार कर अपने मन गुबार भी नहीं निकाल सकते थे ऐसे ही शहर की एक संस्था के अध्यरक्ष वीरेन्द्र जी दस साल से अपने पद पर जमे हुए थे इसके लिए उन्हें बहुत कुछ करना पड़ता था राजेश जी घूमते हुए एक निर्माणाधीन मकान के पास से जा रहे थे अचानक उनकी नजर अनिल प्रसाद पर पड़ी जो मजदूरी कर रहे थे वे अनिल को जानते वे रईस खेड़ा गाँव के भूतपंर्व सरपंच थे । पूछने पर उन्होंने बताया कि पद पर रहते हुए जो धन कमाया था वो चुनाव लड़ने में खर्च हो गया ऊपर से भारी कर्ज चढ़ गया था चुनाव हारने के बाद कर्ज चुकता करने में जमीन मकान सब बिक गया फिर जुए सट्टे की लत लग गई जिसने पूरी तरह मिटाकर रख दिया। पेट भरने के लिए मजदूरी करना पड़ रही है भूतपूर्व की कोई इज्जत नहीं होती है यह अब जाकर पता चला। पद पर रहते हुए लोग अभिमान में ऐसे चूर हो जाते हैं कि वे पद अपनी बपौती मान लेते हैं। ऐसे लोग तब जमीन पर आते हैं जब उनका पद छिन जाता है। और फिर उनकी पूच परख करने वाला कोई नहीं होता है।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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