सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: चापलूसी का सुख

राजनीति हो खेल हो या समाज सेवा हो हर जगह आपको चापलूस मिल जाएँगे । जहाँ चापलूस होंगे वहाँ वे भी होंगे जिनकी वे चापलूसी कर रहे हैं । जो चापलूसी कर कर के घिस गए हैं वो सोचते हैं कब चापलूसी का फल मिलेगा कब हमारे आका हमें पद दिलवाएँगे और कब हमारे पास भी चापलूसों की भीड़ होगी।
ऐसे ही शहर के सबसे बड़े चापलूस करन सिंह जी हैं उन्होंने लगातार बीस साल पहले सुरेश भैया की चापलूसी करना शूरू की थी तब कहीं वे अब उवकी कृपा वे से शहर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बन पाए जब से वे अध्यक्ष बने तब से उनके पास भी चापलूसों की अच्छी खासी संख्या हो गऍई है और!अब उन्हें चरम सुख प्राप्त हो रहा है दूसरी ओर!उनके साथ!के एक खुदूदार टाइप के नेता लीला राम बीस साल के राजनैतिक जीवन में पार्षद तक नहीं बन पाए थे अभी हाल! ही में उन्होंने प्रभारी मंत्री जी को किसी बात पर खूब खरी खोटी सुना दी जिसका नतीजा ये हुआ कि मंत्री जी ने उन्हें पार्टी से बाहर करा दिया इससे उनकी रही सहो पूछ परख भी छत्म हो गई। जबकि करन सिंह का बड़ा रुतबा है क्योंकि वे मंत्रीजी के सबसे चहेते और सबसे पुराने चापलूस हैं जब सुरेश भैया बीस साल पहले पहली बार विधायक बने थे तब से करन सिंह जी का एक ही काम था सुब्ह दस बजे उनके पास पहुँच जाना दिन भर उनकी चापलूसी करने के बाद वे रात को ग्यारह बजे घर!आते थे यह क्रम वर्षों तक चलता रहा सुरेश जी का सारा लेन देन उन्हीं के जरिए होता दस साल विधायच रहने के बाद जब सुरेश भैया मंत्री बने तब उन्हें ऐसा लगा कि अब उन्हें अपनी वर्षों की चापलूसी का इनाम मिलने वाला है पर ऐसा हुआ नहीं करन सिंह ने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी और मंत्री जी ची चापलूसी पहले की तरह करते रहे जब सुरेश भैया तीसरी बार केबिनेट मंत्री बने और नगरीय प्रशासन का विभाग मिला तब उन्होंने करन सिंह को नगर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिया करन सिंह को अपनी एकनिष्ठ चापलूसी का फल मिल गया था वो प्राधिकरण करन सिंह की चारागाह बन गया था जिसमें उनकी मौज ही मौज हो रही थी अब उनके पास भी चापलूस आने लगे थे जो उन्हें चापलूसी का असीम सुख प्रदान कर रहे थे। और उनकी चापलूसी करने वाले भी इसी आशा में चापलूसी कर रहे थे कि वो कभी न कभी तो उसका फल देंगे उन्हें उसी फल का तो इंतजार है। जो अपने धीरज को रखकर वे कर रहे थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...