सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: आयोजक की मौज

हर छोटे बड़े शहर कुछ ऐसे आयोजक मिल जाएँगे जो मुक्त चंदन घिसकर रेवताओं को खुश कर के उनसे मनचाहा वर प्रापत करके मौज करते हुए मिल जाएँगे। ये लोग अपनी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं करते बल्कि हर आयोजन में काफी पैसा हड़पने में कामयाब होते हैं और उस पैसे से मौज करते हैं। इनकी आयोजन पर पूरी पकड़ रहती है। किसको अध्यक्ष बनाना है, किसको मुख्य अतिथि, किससे संचालन कराना है, किसके फोटो अखबार में देना है और किसके नाम छपवाना, कौन आभार व्यक्त करेगा इसका निर्णय भी उनके हाथ में रहता है। लोग अपनी प्रशंसा सुनने के आदि रहते हैं। कोई अगर उनकी निंदा कर ले उसे ऐसी जगह ले जाकर निपटाते हैं कि फिर वो कहीं का नहीं। जो आयोजन के लिए चंदा देते हैं उनका नाम लेने वाला कोई नहीं होता। उनके चंदे पर मजे करने वाले आयोजक सारा श्रेय लूट लेते हैं।
ऐसे ही शहर के एक स्वनाम धन्य आयोजक हैं धनसुखलाल जी। उनके बड़े जलवे हैं पहले वे मजदूरी करते थे। वहीं से उनसे एक पार्टी के नेता ने कहा एक बस भरकर भीड़ के लिए लोगों की जरूरत है। क्या तुम व्यवस्था कर सकते हो। धनसुख बोले क्यों नहीं उस नेता ने उसके लिए एडवाँस में रुपये दे दिए। उसमें उनकी इतनी बचत हो गई जिससे उन्होंने एक सेकेण्ड हैण्ड मोपेड खरीद ली। उन्हें यह धन्धा बड़े लाभ का नजर आया। इसके बाद उन्होंने मजदूरी करना छोड़ दी। तब से आज तक वे लोगों के चंदे पर ऐश कर रहे हैं। चुनाव में जिस प्रत्याशी के प्रचार की कमान उन्होंने सम्हाली थी वो तो हारकर बर्बाद हो गया था। पर धनसुखलाल जी ने उस पैसे से एक कार खरीद ली थी। इसके बाद वे जीतने वाले के खास बन गए थे। वे उसे विश्वास दिलाने में सफल हो गए थे कि उनकी जीत उनके कारण हुई है। शहर में आयोजन कैसा भी हो पर उसमें धनसुखलाल की अहम भूमिका जरूर रहती है। ऐसे अवसरवादियों का दौर कभी खत्म नहीं होता हर दौर में इनकी अहमियत बनी रहती है।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...