कुछ बड़े लोग ऐसे होते हैं जिन्हें गरीबों से बहुत नफरत हुआ करती है ये बात तो गरीबों के भलेके दिखावे की करते हैं लेकिन गरीबों के शोषण में इनका बड़ा हाथ होता है ये उन्हें कभी पनपने ही नहीं देते पेटभर रोटी जुटा ले और झुग्गी में रह ले इतना ही वे उनूहें देने देते हैं और गरीब इनकी मीठी बातों में आकर इन्हें अपना हितैषी समझता रहता है।
ऐसे ही एक निजी अस्पताल के संचालक का कहना था कि अगर कोई गरीब आए तो उसे तब तक फालतू के इलाज में उलझाकर रखो जब तक उसके आयुष्मान कार्ड की रकम पूरी खर्च न हो जाए सही इलाज तब करो जब वो अपना घर बार जमीन बेचकर पैसा जुटाकर लाए जब इलाज कराचर लौटे तो उसके पेट भरने के लायक रोटी की भी व्यस्था न हो सके और वो मुफ्त के भोजन की लाइन में खड़ा नजर आए।
गरीबों से नफरत करने वालों में उन बड़े लोगों की अच्छी संख्या है जो खुद गरीबी से उठकर बड़े आदमी बने हैं ऐसे ही मंत्री महोदय जीवन लाल जी भी गरीबों के मसीहा का मुखौटा लगाकर रहते थे हाँलाकि वे गरीबी से मंत्री बनने के बाद ही बाहर हो गए थे अब वे भी अमीरों की जमात में शामिल थे। लेकिन हर साल वे अपने स्वर्गीय पिताजी के जन्मदिन पर गरीबों को साडियाँ कपड़े तथा छाता बाँटा करते थे इस अवसर पर जो वे कार्यक्र आयोजित करते थे उसमें दो सौ रुपये से अधिक की साड़ी नहीं होती थी चालीस रुपये का छाता होता था कुल चालीस हजार रुपये खर्च करते थे और!इसके बदले दो लाख का चंदा वसूल कर लेते थे बाकी सारा पैसा वे भड़कीले आयोजन एवं प्रचार प्रसार तथा अपनी छवि चमकाने में करते थे रात को वे अपने बड़े लोगों को फाइव स्टार होटल में डिनर देते हैं जिसमें वो सात लाख रुपये खर्च देते थे उसकी खबर अखबारों में नहीं छपती थी अखबारों में तो गरीबों को साड़ी बँटने की खबर छपती है और मंत्री के मगर!मच्छी आँसू से भरा चेहरा नजर आता था । दूसरी ओर शहर के एक उद्योग पति के एम डी जब एक शाखा का निरीक्षण करने गए तो उस शाखा के प्रबंधक ने कहा कि सर यह प्रकाश है यह बहुत काम करता है मार्केटिंग में भी सहयोग देता है पर इसे वेतन कम मिलता है उन्होने कहा कितना वे बोले दस हजार रुपये महीना इसको बढ़ाकर बारह हजार करना चाहिए एम डी बोले ये है कौन वे बोले ये चपरासी है ये सुनते ही एम डी बोले इसे तो ज्यादा वेतन मिल रहा है हम चपरासी को आठ हजार रुपये से ज्यादा वेतन नहीं देते और वे उसका वेतन बढाने के बजाए दो हजार रुपया कम करके आ गए। जबकि उनका वेतन मालिक ने ढाई लाख से बढ़ारकर तीन लाख रुपया महीना कर दिया था। जब तक कुछ बड़े लोगों की मानसिकता नही बदलेगी तब तक गरीबों अभीरों के बीच की खाई बढ़ती रहेगी।
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प्रदीप कश्यप
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