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व्यंग्य: चापलूसी की महिमा

नत्थूलाल के पास कोई विशेष योग्यता नहीं थी ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं था उसकी एक ही खूबी थी कि कुशल पुरा क्षेत्र में कोई उससे बड़ा चापलूस नहीं था आज उसी चापलूसी की बदौलत वो जनपद अध्यक्ष था उसकी निगाह में बाकी सब छोटे लोग थे जिन्हें वो अपने स्तर का नहीं मानता था। 
नत्थूलाल को जिन्होंने प्राइमरी में पढ़ाया था वे शिक्षक विजय जी का तबादला दुर्गम स्थान पर हो गया था वे यह सोचकर नत्थूलाल के पास तबादला रुकवाने गए कि वो उनका पूर्व शिष्य है एर नत्थूलाल ने उनसे इसके एक लाख रुपये माँगे तो सर बोले कि कुछ तो लिहाज करो इस पर नत्थूलाल बोला तमीज से बात करो तुम्हारे एच एम तो मेरे साभने कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं करते तबादला मन पसंद जगह पर कराना है तो रुपये देना पड़ेगे तुमने मुझे बहुत जलील किया था मुझे नालायक और निकम्मा कहते थे और!जिस आशीष की तुम तारीफ करते नहीं थकते थे न वो भी मेरे पास आया था उससे मैंने इसी काम के पूरे पाँच लाख रुपये लिए थे और उसने बिना ना नुकुर किए दे दिए थे। डॉक्टर बनकर भी उसे काम तो मेरे से पड़ा न विजय सर के पास और कोई चारा नहीं था। उन्हें आखिर रुपये देना पढ़े।
इसके बाद विजय सर को तब और हैरत हुई जब मंत्री जी का दौरा हुआ कार्यक्रम स्कूल प्रांगण में रखा गया था उनके भोजन की व्यवस्था एच एम ने की थी जिसमें उनके पूरे चालीस हजार रुपये खर्च हो गए थे । कार्यक्रम चल रहा था नत्थूला मंत्री जी के पास कुर्सी पर बैठा हुआ था एच एम भी कुर्सी पर बैठे थे उन्हें किसी काम से जाना पड़ा तो उनकी कुर्सी पर एक छुट भैया बैठ गया तो एच एम की हिम्मत नहीं हुई उससे कुछ कहने की पूरे कार्यक्रम में एच एम खड़े ही रहे जब एच एम ने जिले के वरिष्ठ अधिकारी को भी अपनी तरह खड़ा देखा तो वो उनके लिए कहीं से कुर्सी लाने को उद्यत हुए तो अधिकारी जी ने रोक दिया कुछ मत करो अच्छा कार्यक्रम चल रहा है कोई विवाद खड़ा नहीं करना अभी एक कार्यक्रम में नत्थूलाल ने एक मैदानी कर्मचारी को बहुत बुरा डाँटा था उसकी इतनी गलती थी की वो कुर्ता पजामा पहनकर आया था और उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया था वो डाँट सुनकर अपमान के घूँट पीचर रह गया था नत्थूलाल ने कहा था अपनी औकात में रहो हमारी बराबरी करने की कोशिश मत करो। विजय सर को याद आया जब नत्थूलाल की हरकतों से तंग आकर उन्होंने उसे स्कूल से निकलवा दिया था तब उसने सरपंच की चापलूसी कर विजय सर का निर्णय बदलवा दिया था तबसे नत्थूलाल को चापलूसी की महिमा पता चल गई थी आज नत्थूलाल उसी चापलूसी के दम पर इतने बड़े पद पर बैठा था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद नत्थूलाल तो अपनी मर्सीडीज से चला गया और एच एम सर चालीस हजार रुपये भोजन पर जेब से खर्च करने के बाद भी भूखे रह गए थे मंत्री जी के साथ कई अनामंत्रितों ने सारा भोजन चट कर!दिया था एच एम सर को इसके बाद भी संकुल प्राचार्य की डाँट खाना पड़ी थी आहत होकर बेचारे अपनी स्कूटी पर किक पर किक मार रहे थे पर स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही थी भूख के मारे बेहाल थे लोग मजे लेकर उन्हें परेशान होते देख रहे थे कोई उनकी मदद को आगे नहीं आ रहा था पचपन साल के भूखे शिक्षक के प्रति किसी के मन में कोई सहानुभूति नहीं थे अकेले विजय सर उनकी मदद कर रहे थे यह आज का दौर था पुराने दिन नहीं थे जब गुरू का लोग दिल से सम्मान करते थे। बेचार चार किलोमीटर स्कूटी धकाकर हाइवे पर आए तब वहाँ उसे ठीक करवाई रात को साढ़े ग्यारह बजे अपने घर पहुँचे थे । उस समय नत्थूलाल किसी सुंदरी के हाथों के जाम से सुरापान का आनंद ले रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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