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व्यंग्य: बड़े नाम वाले लोग

ज्यादातर बड़े नाम वाले लोग कोरे नाम का ही लाभ उठाते है असल मेहनत तो वो लोग करते हैं जिनका नाम कभी सामने नहीं आता एक ऑफिस में पूरा प्रोजेक्ट बाबू सेवा लाल जी ने बनाया बड़े साहब ने सिर्फ उस पर दस्तखत किए लेकिन जब प्रोजेक्ट पास हुआ तो उसका सारा श्रेय बड़े साहब को मिला सेवालाल जी तो इसी से संतुष्ट हो गए कि साहब कितने खुश हैं।
सेवालाल जी की रात दिन की मेहनत ने बड़े साहब के नाम को खूब चमका दिया था इसका फायदा सेवाला जी को बिल्कुल नहीं मिला था सेवालाल जी की दम पर बडे साहब का प्रमोशन हो गया था किसी ने बड़े साहब से कहा कि सेवालाल जी का भी कुछ भला कर दो इनका भी प्रमोशन करा दो इस पर! बड़े साहब ने कहा इनका इस ऑफिस में होना जरूरी है इनका प्रमोशन करके मैं इस ऑफिस की व्यवस्था खराब नहीं करूँगे मैं ही क्या इनका प्रमोशन कोई भी अधिकारी नहीं करेगा नए साहब आएँगे तो यही सेवालाल जी उनके भी काम आएँगे।
  दूसरों की मेहनत पर मजे करने वाले बहुत मिल जाएँगे जो सही मेहनत करने वाले के हिस्से में छाछ छोड़ेंगे और सारे मक्खन का उपभोग वे करेंगे कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे कोई और पेड़ नहीं पनपता है बरगद उनके हिस्से को भी हड़प लेता है 
। हाल ही में विधान सभा के चुनाव हुए चुनाव में रात दिन एक कर नेताजी को जिताने वाले कार्यकर्ता को नेताजी भूल गए और दूसरे लोगों से हाथ मिला लिया हद तो तब हो गई जब नेताजी ने अपने विरोधी पर दायर केश को वापस लेने के निर्देश उन्होंने उस कार्य कर्ता को दिए जिसका उन नेता जी के कारण उसका झगड़ा हुआ था कार्यकर्ता बोला आज तक आपने मेरा कोई काम नहीं किया है और जो आपका दुश्मन रहा उसकी पैरवी कर रहे हो मैं ऐसा नहीं करूँगा इस पर नेताजी नाराज हो गए उन्होंने उस कार्यकर्ता को पार्टी से निकलवा दिया और उसे शहर छोड़ने पर विवश कर दिया। तब से उस कार्यकर्ता ने राजनीति से ही सन्यास ले लिया था। ये खुदगर्ज लोग तब तक भाव देते हैं जब तक उन्हें अपनी गरज निकालना होती गरज निकलने के बाद यह पहचान ना ही भूल जाते हैं। बड़े साहब की चिकनी चिपड़ी बाते छोटे समझे जाने वाले लोगों को बुरी तरह मिटाकर रख देती हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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