सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : मंच के सेटिग बाज कवि

एक चुटकुले बाज अपनी कुल जमा तीन कविताओं की बदौलत कवि सम्मेलन के जाने माने कवि दीपक जी अपने चुटकुलों से सबको हँसाने में माहिर थे उनके पास न तो चुटकुले अपने थे न ही वे तीन कविताएँ अपनी थी वे कविताएँ भी हथियाई हुई थीं दीपक जी जब इन्दौर के बड़े मंच पर! चुकुलों से लोगों को खूब हँसा रहे थे तब श्रोताओं के बीच में एक भूतपूर्व कवि सतीश जी बैठे सुए थे जो अब कविता लिखना छोडकर किराने की दुकान चला रहे थे और! जिन तीन कविताओं की बदौलत दीपक जी कवि सम्मेलन के सफल कवि थे वे सतीश जी की ही थीं ।
 सतीश जी तब लिखना छोड़ दिया था जब लिखने से उनके भूखों भरने की नौबत आ गई थी तबु उन्होंने अपनी कविता की डायरी लकडी के बक्से में बंद कर पैसा कमाना शुरू कर दिया था।
उस समय दीपक जी कॉलेज में पढ़ते थे तब उन्होंने कॉलेज में कवि सम्मेलन कराया था सतीश जी उस समय तंग हाल थे तब दीपक जी ने उनके राशन पानी की व्यवस्था कर के उन से तीन कविताएँ लिखवाई थीं। उस कवि सम्मेलन से दीपक जी ने कविता पाठ की शुरूआत की थी वहीं उन्हें मंच के गुरू घंटाल कवि रोशन जी मिल गए उनके पास भी कुल आठ कविताएँ थीं पर वे भी मंच की शान थे दीपक जी को उन्होंने होनहार मानकर!अपना शिष्य बना लिया था उन्होंने कहा कि कवि सम्मेलन में सब सेटिंग से होता है ये जितने भी कवि हैं इनके पास आयोजक हैं । आयोजन में ये जिन कवियों को कविता पाठ के लिए बुलाते हैं फिर वो उन्हें बुलवाते रहते हैं दूसरा कोई कवि कितना ही योग्य क्यों न हो ये उसे मंच तक पहुँचने ही नहीं देते थे। सब कविताओं का आदान प्रदान कर काम चलाते थे। चुटकले पैरोडी और नोंक झौंक करने में कवि सम्मेलन खत्म हो जाता था बीच में थोड़ी बहुत कविताएँ भी हो जाती थीं दीपक जी ने बताया तुम जैसे कवियों की कविताएँ तो मंच पर चल जाती हैं पर !तुम मंच तक नहीं पहुँच सकते सतीश बोले हमें तो कविताओं ने भुखमरी के सिवा कुछ नहीं दिया इसलिए तो हमें किराने की दुकान खोलना पड़ी यह मंच तुम जैसों के लिए बना है हमारा इससे कोई लेना देना नहों है।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...