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व्यंग्य: गरज निकालने वाले

नत्थूलाल जी आजकल श्याम लाल की बड़ी ख़ुशामद कर रहे थे उन्होंने श्यामलाल जी को पूरी तरह मोहित कर लिया था श्यामलाल जी भी उनका अपनापन देखकर पुरानी कड़वाहट भूल गए थे और नत्थूलाल जी को अपना करीबी समझने लगे थे नत्थूलाल जी का ये प्रेम ऊपरी दिखावा था दर असल श्याम लाल जी से उन्हें अपनी गरज निकालनी थी इस लिए वे उनकी इतनी ख़ुशामद कर रहे थे और इस ताक में थे कि कब उनकी गरज निकले और वे कब श्यामलाल को जिन्हें वे अपने पीठ पर लादकर चल रहे थे उन्हें किसी गहरी खाई में ले जाकर पटक दें ।
ये गरज निकालने वाले लोग बड़े शातिर होते हैं जब इन्हें गरज निकालने होती है तो गधे को भी अपना सब से खास रिश्तेदार बना लेते हैं जिससे उनका मतलब न हो वो भले ही उनका बाप ही क्यों न हो उस से भी मौँह मोड़ लेते हैं इसी बात का रोना बाबूलाल भी रो रहे थे उनका इकलौता लड़का नरेश शादी के बाद उसी मकान में अपना हिस्सा लेकर अलग रहने लगा था जबसे वो अलग हुआ था तब से उस ने माँ बाप से बोलचाल तक बंद कर दी थी दोनों के आँगन एक ही थे एक बार नरेश के ससुर आए हुए थे नरेश उनकी खातिरदारी कर रहा था वो उनके लिए होटल से गरमागरम नाश्ता लेकर आया था उनके लिए स्पेशल चाय बनवाई थी। बाबूलाल जी की तरफ न बेटे ने देख था न उसका ससुरने वे इस बात से बहुत दुखी थे सोच रहे थे अब बेटे को मुझ से कोई मतलब नहीं है तो उसने मुझे गैर बना दिया । लेकिन वो भी क्या करते ऐसे खुद गर्जॅ लोगों से दुनिया भरी पड़ी है बड़े साहब के खास चमचे की भी लोग यही सोचकर खुशामद करते हैं कि वक्त आने पर !यह उनके बहुत काम आएगा जिस से बड़े साहब नाराज हो जाएँ उससे सब कन्नी काट लेते हैं बड़े लोग खुशामदियों से घिरे हुए हैं जो उन्हें ठीक से काम नहीं करने देता जो नेता बड़ा पद पा लेता है तो तुरंत सी खुशामदियों से घिर जाता है कड़वी और हितकर बात कहने वाले लोगों को ये खुशामद पसंद लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में वास्तविक हकदार लोगों के साथ अन्याय होता है छोटे लोगों के हकों पर डाका डाला जाता है और उसका लाभ चापलूसों को पहुँचाया जाता है। जो किसी की चापलूसी करना पसंद नहीं करते उनके सही कामों में भी रोक लग जाती है और खुशामद करने वाले लोग अपात्र होकर भी भर पूर लाभ उठा लेते हैं। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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