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कुंडली: मार कर बैठे हुए लोग

कुछ चपल चालाक रेंगकर चलने  वाले लोग  आपको जाहाँ कुंडली मारकर बैठे हुए दिख जाएँ तो समझ लेना  कि वे   वहाँ दुग्ध पान कर के विष उत्पन्न करने का कार्य कर रहे हैं ये लोग कुंडली मारकर कई वर्षों से जमे हुए इन्हें हटाने की किसी में हिम्मत नहीं होती ये अपना फन फैलाकर जब किसी को फुँफचार कर देखते हैं तो उसकी रूह काँप जाती है।  ऐसे ही शहर के एक कथित समाज सेवी  कामता प्रसाद हैं वे एक समाज सेवी संगठन पर कुँडली  मारकर चालीस वर्षों से बैठे  हुए दुग्धपान का आनंद ले रहे हैं।
पूरा संगठन कामता जी के झोले में समाया हुआ है हर साल सरकार से मोटा अनुदान लेकर हड़प जाते हैं रसीद कट्टा हमेशा उनके पास रहता है । चंदा वसूलने में उन्हें महारत हासिल है   चंदे से उनको सबसे ज्यादा लाभ होता है उस पर वे अपना हक समझते है। वे हर साल चुनाव का नाटक करते हैं लेकिन पदाधिकारी सब उनके खास अपने  होते हैं। जो विरोध करता है उसे निपटाना वे अच्छी तरह जानते हैं ऐसे लोगों का कोई जमीनी आधार नहीं होता। ये लोग अच्छी तरह जानते हैं कि किस से कितना लाभ उठाया जा सकता है और किस हद तक उसे मूँडा जा सकता है जब वे उसका पूरा उपयोग कर लेते हैं तब उसकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखते  ऐसे लोग खुद चापलूसी करते हैं और जो उनकी चापलंसी  करते हैं उनसे वे हमेशा खुश रहते हैं।   उनको किसी भी तरह से फँसाया नहीं जा सकता है  ऐसे ही एक  और!कथित समाज सेवी थे वे आजीवन कुंडली मारकर एक संस्था पर बैठे रहे उनके मरने के बाद अब उस पर उनके एक निकटतम रिश्तेदार कुँडली मारकर बैठे हुए हैं शहर में इतनी समाज सेवी स्वयंसेवी संस्थाए हैं कि अगर ये अपना काम ईमानदारी और साफ नियत रखकर करें तो समाज में समस्या  जड़ से मिट जाए पर ऐसा होता नहीं है।  इनके कुछ सरपरस्त इनका हर हाल में संरक्षण करते हैं। कुछ भुक्त भोगी इनसे दूरी बनाकर रखने में ही अपनी भलाई मानते थे और जो इनकी फितरत से अनजान रहकर इनके कहे को पत्थर की लकीर मान लेते हैं उनको ये कहीं का नहीं छोड़ते हैं ये अपने अलावा किसी को कुछ नहीं समझते जिससे मतलब होता है उस पर ध्यान देते सैं जिससे मतलब नहीं होता उसकी तरफ देछते तक नहीं है। ये लोग जो समाज में बदलाव लाने की बात करते हैं वे अपने आपको ही नहीं बदल पाते  तो दूसरों को क्या बदलेंगे  ये तो रेंगकर चलने वाले हैं   सीधे होकर चलें कैसे इनके पास तो पैर ही नहीं हैं।  बस एक मुँह है जिसमें हमेशा विष भरा रहता है।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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