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व्यंग्य: अचानक वरिष्ठ रंगकर्मी बनने की करामात

गाँव खेड़े में होने वाले नाटकों में छोटे मोटे रोल करने वाले रतिराम जी सरकार बदलने तथा लालजी राम के संस्कृति मंत्री बनने पर संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष बनने के बाद अचानक रातोंरात प्रदेश के वरिष्ठ रंगकर्मी बन गए थे। अखबारों में उनके इंटर व्यू छप रहे थे रंगकर्म पर उनकी कही हर बात को प्रमुखता दी जा रही थी एक निजी विश्विद्यालय ने तो उन्हें रंगकर्म के क्षेत्र!में उनके किए योगदान पर पी एच डी की मानद उपाधि तक दे दी थी रंगकर्म पर उनकी लिखी एक पुस्तक भी प्रकाशित होने वाली थी राज्य की राजधानी में उन्हें सरकारी बंग्ला मिल गया था और अकादमी का चालीस एकड़ के परिसर एवं उसमें बने भव्य भवन उनकी जागीर बन गए थे।
जबसे रतिराम अकादमी के अध्यक्ष बने थे तबसे हर बड़ा से बड़ा रंगकर्मी उनके सामने अदब से पेश आ रहा था उनकी कही बात को गंभीरता से ले रहा था अब रतिराम आम आदमी के दर्जे से खारिज होकर खास आदमियों में शामिल हो गए थे उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिल गया था और अब वे हवाई जहाज में सफर करने लगे थे।
रतिराम के जीवन की शुरूआत छोटे से गाँव शेरपुर से हुई थी । उनके पिताजी के पास थोड़ी सी खेती थी जबकि लालजी राम मजदूर परिवार के थे लालजीराम राजनेता बन गए और रतिराम गाँव में रहकर मेले ठेलों में आयोजित नाटकों में छोटे मोटे रोल करने लगे फिर वे कलाकार दिखने के लिए कुर्ता पजामा पहनते थे। और शहर में रहने लगे थे जहाँ वे एक दुकान पर काम कर रहे थे लालजीराम के पास कोई काम नहीं था पिताजी ने घर से निकाल दिया था तो वे शहर आकर रतिराम के पास रहने लगे उन्हें मुफ्त खाना मिलने लगा तथा रहने का ठिकाना रतिराम से कुर्ता पजामा माँगकर वे राजनीति कर रहे थे उनके भाग्य ने पलटा खाया विधायक बने और फिर मंत्री बन गए मंत्री बनते ही उन्होंने रतिराम को संगीत नाटक अकादमी का अकादमी का अध्यक्ष बना दिया था तभी से रतिराम जी मजे कर रहे थे और जो सच्चा रंगकर्मी है वो आज भी भुखमरी की कगार पर बैठकर अपना गुजारा कर रहा था । इस समाज में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो रतिराम को उनकी सच्चाई बता सके सब झूठ बोल रहे हैं क्योंकि उनको अकादमी से लाभ उठाना है इसिलिए अध्यक्ष को साधना जरूरी है भले ही वो रतिराम जैसे ही क्यों न हों उन्हें इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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