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व्यंग्य: खरी बात खोटों से कहने की सज़ा

एक तरफ जहाँ चापलूसों की भरमार हैं वहीं दूसरी तरफ बेहिचक खरी बात कहने वाले भी बहुत हैं पर ये खरी बात कहने का बड़ा नुक्सान उठाते हैं एक पार्टी के प्रमुख से पार्टी की बार बार हार से छुब्ध होकर एक छोटे नेता ने खरी और सीधी बात कहकर उस प्रमुख को नाराज कर दिया। चापलूसों ने आग में घी का काम किया और उस प्रमुख ने अपनी कमियों और !गलतियों पर ध्यान न देकर उस खरी बात कहने वाले नेता को पार्टी से ही निकाल दिया सही और खरी बात कहने की उसे ये सजा मिली थी।
वो दौर कब का गया जब मुखिया का सब अनुकरण करते थे और!मुखिया की बात पर लोग सब कुछ लुटा देते थे आज के अधिकाँश मुखिया दलाली कर रहे हैं उन्होने अपना ईमान कब का बेच दिया है । ऐसे ही एक स्वयंभू संगठन के अध्यक्ष के पास एच पीड़ित आया बोला आप हमारे नेता हो आपकी बड़ी ऊँची पहुँच है मेरा तीन साल पहले अनुचित सूथानांतर कर दिया गया था। आप मेरा सही जगह स्थानांतर करा दीजिए उन्होंने आवेदन ले लिया चार दिन बाद आए बोले मैंने बात कर ली है काम हो जाएगा लेकिन दो लाख रुपये देने होंगे पीड़ित बोलाआप तो मंचों से बड़ी बड़ी बातें करते हो फिर यह पैसा क्यों वे बोले मंच के भाषण को मंच तक ही रखो और बोलो पैसे दोगे । या नहीं दोगे काम तभी होगा। पीड़ित कुछ नहीं बोले उनके पास इतने पैसे ही नहीं थे तभी उन्हें एक दूसरे पिड़ित मिले उन्होंने कहा तुमने उस चोर को रुपये तो नहीं दिए पीडित बोला नहीं दिए वो बोला देना भी मत वो कई लोगों के पैसे हजम कर चुका है और उनके काम भी नहीं किए हैं उस बैगरत इंसान ने। एक ऑफिस में एक पीडित चालीस हज़ार रुपये की रिश्वत देकर आया तब कहीं उसका काम हुआ। उसके पास इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था हमने उससे कहा उसकी शिकायत वरिष्ठ अधिकारी से कर देते वो बोले कैसी मूर्खता पूर्ण बातें कर रहे हो रिश्वत की मोटी रकम तो उसके पास जाएगी । जिसे चालीस हजार दिए हैं उसके पल्ले तो सिर्फ एक हजार रुपये ही पड़ेंगे हम अगर पैसे नहीं देते तो हमारा काम कभी नहीं होता। अब तो समाज ने भी स्वीकार कर लिया है कि काम कराना है तो रिश्वत देनी ही पड़ेगी। अपने खास लोग ही कहते हैं कि काम नहीं हो रहा तो कुछ ले दे के काम करा लो। और लोग उनकी बात मान भी लेते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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