सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: ऐसे जीता चुनाव

रोशनलाल जी को राजनीति में आए पूरे पन्द्रह साल हो गए थे पर वे अभी तक कोई बड़ा पद हासिल नहीं कर सके थे इस बार उन्होंने अपने आप को पूरी तरह बदलकर अपने जमीर को बेचकर विधायक का चुनाव लड़ा था और पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी वो जीत गए थे।उनका भव्य!जुलूस निकला था हारने वाला अलग थलग पड़ गया था और अपनी हार का शौक मना रहा था।
रोशनलाल जमीर रखकर राजनीति में आए थे और जमीर बेचकर चुनाव जीते थे उन्होंने दो बार के विधायक रहे अशोक को हराया था पार्टी ने उन्हें निकाल दिया था पर इसकी परवाह उन्होंने की नहीं थी राजनीति में रहते हुए वे अच्छी तरह समझ गए थे कि छल कपट प्रपंच झूठ धोखा विश्वासघात के बिना राजनीति में बने रहना कठिन है इस बार पार्टी से टिकिट के लिए अशोक पूरे दो करोड़ रुपये देकर आए थे। रोशनलाल तीन करोड़ रुपये लेकर पहुँचते इसके पहले ही अशोक के नाम की घोषणा हो गई। लेकिन उनके समर्थकों ने उन्हें चुनाव मैदान में उतार दिया अशोक को अभिमान ने जकड़ रखा था वो ये मानकर चल रहे थे उन्हें हराने वाला कोई नहीं है जबकि उनसे खार खाए लोगों की अच्छी खासी संख्या थी घमंड में आकर उन्होंने कार्यकर्ताओं को भी भाव देना बंद कर दिया था अशोक भी एक भ्रष्ट नेता थे भ्रष्टाचार से उन्होंने खूब धन कमाया था। झोपड़ी से महल में आ गए थे मगर आज तक एक धेला भी नहीं कमाया था हर महीने लाखों रुपये उन्हें भ्रष्टाचार से मिलते थे पैसा खूब था उन्होंने चुनाव में इसे अनाप शनाप खर्च किया था। दूसरी ओर रोशनलाल जी ने शराफत ताक पर रख दी थी सारी बड़ी हस्तियों से हाथ मिला लिया था सारे भीतरघाती रोशनलाल जी के साथ थे कुछ तो ऐसे भी थे जो अशोकजी के रुपयों पर मजे कर रहे थे और प्रचार रोशनलाल जी का कर रहे थे। रोशनलाल जी के चुनाव जीतने के बाद राजनीति का माहौल तेजी से बदल गया था सरकार बनाने के लिए एक विधायक कम पड़ रहा था अब वे सब बड़े बड़े नेता रोशनलाल जी को मना रहे थे जिन्होंने उन्हें पार्टी से निकाला था रोशनलाल जी के पास जमीर तो था नहीं। इसलिए उन्होंने जमकर सौदेबाजी की पार्टी के नेता को समर्थन देकर मनचाहे विभाग वाले केबिनेट मंत्री का पद उन्होंने हथिया लिया था इसके बाद पूरे पाँच साल तक उन्होंने अनगिनती पाप किए थे अपने पद का बुरी तरह से दुरूपयोग किया था बड़े लोगों को खुश करने में और गलत लोगों के गलत काम कराने में रोशनलाल भी आम जनता से दूर हो गए थे छोटे और गरीबों को वे हेय दृष्टि से देखने लगे थे दूसरी बार जब उन्हें पार्टी ने टिकिट दिया तो पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद वो चुनाव हार गए थे चुनाव हारने के बाद उनके पाप फूटकर निकलने लगे थे अब उनकी कोई कीमत नहीं रह गई थी जो चुनाव जीता था वो उनका घोर विरोधी थे उसने गढ़े मुर्दे उखाड़कर उन्हें जेल भिजवा दिया था जहाँ उनका मानसिक संतुलन गड़बडा गया था किसी की जरा सी भी सहानुभूति उनके साथ नहीं थी पद पर रहते हुए जो घनघोर पाप उन्होने किए थे वे उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे पागल होने के बाद शायद उनका जमीर फिर जिंदा हो गया था।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...