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व्यंग्य: पाखंडियों के जलवे

चालाक चपल और चतुर लोगों जो बातें बनाने में माहिर होते हैं वे अनेक प्रकार के पाख॔ड रच कर तंत्र !मंत्र!जादू टोने का भ्रम फैलाकर लोगों को मूर्ख बनाकर खूब धनवान बन गए हैं इन्होंने मान सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर ली है इनके जाल में फंसे लोग अपनी मेहनत की कमाई इनके हवाले कर के बर्बादी की कगार पर!आ गए हैं।
ऐसे ही शहर के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की बेटी अचानक बीमार हो गई इलाज चला पर जल्दी ठीक नहीं हो पा रही थी किसी ने उन्हें एक कथित बाबा का पता बता दिया उस कथित बाबा ने उन्हें अपने जाल में फँसा लिया उन्होंने अपनी बेटी का इलाज बंद करके कथिता बाबा पर विश्वास कर! लिया जो पढ़ा लिखा भी नहीं था साल भर में उस कथित बाबा ने उनसे लाखों रुपये हड़प लिए इसके बाद भी वे अपनी बेपी की जान नहीं बचा पाए आखिर में वो तड़प तड़पकर मरी वे घर के मकान को बेचकर किराये के मकान में आ गए थे और उस कथित बाबा की झुग्गी अब आलीशान मकान का रूप ले चुकी थी उस कथित बाबा के यहाँ रोज लोगों की भीड़ लग रही थी जिनसे वो खूब पैसा ऐंठ रहा था। और शहर के अत्यंत प्रभावशाली लोगों में उसकी गिनती होने लगी थी । इस तरह के पाख॔डी लोग आपको हर क्षेत्र में मिल जाएँगे जिनका काम ही है दूसरों की कमाई पर मौज करना है। कमीशन के नाम पर दलाली के नाम पर ये खूब रुपये ऐंठते हैं कुछ आपको सरकारी दफ्तरों के आसपास मँडराते नजर आएँगे सौ प्रतिशत काम कराने की गारंटी के साथ ये लोगों से मोटा कमीशन वसूल कर मजे करते हैं बस स्टेण्ड पर एक भाई के जलवे देखने को मिले जो भी बस आती या जाती वो भाई को बिना कुछ कहे पैसे देकर जाती थी भाई जब शाम को घर आते तब उनकी नोटों से जेब भरी होती थी ऐसी किसी बस वाले की हिम्मत नहीं थी जो भाई को पैसे दिए बिना अपनी बस ले जा सके। कुछ लोग मुफ्त की ही खा रहे हैं एक बीस साल से नौकरी पर नहीं गया फिर भी उसे घर बैठे पूरी तनख्वाह मिल रही थी। इनके मकड़ जाल में जो फंस जाता है वो फिर कभी निकल नहीं पाता और ये उसके खून को चूसचर अपना कलेवर बढ़ाते रहते हैं। इन लोगों की चुनावों में बड़ी भूमिका रहतो है उस समय इनकी खूब कमाई होती है लोगों ने इनके साथ रहकर जीना सीख लिया क्योंकि वे समझ गए हैं कि इनकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नहीं है इसलिए वे मनमानी करने में जरा भी नहीं हिचक रहे हैं।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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