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भ्रष्टाचार या शिष्टाचार -- व्यंग्य

भ्रष्टा चार  पर इतना अधिक लिखा और कहा जा चुका है कि  लोग अब इस बात को महत्व ही नहीं देते भ्रष्टाचार हमारे देश में सहज रूप से स्वीकार्य हो चुका है। रिश्वत देना लोगों की आदत बन चुकी है वही रिश्वत लेना  भी  भी लोगों ने अपने अधिकार में शामिल कर लिया है घर पर गैस सिलेंडर लाने वाले को भी ऊपर से रुपये देना दस्तूर में शामिल हो गया है । यहाँ मैं इस विषय में ज्यादा कुछ न कहते हुए  कुछ संस्मरण देना चाहूँगा।
एक जिला अस्पताल में सिविल सर्जन के रूप में डॉक्टर अशोक पदस्थ थे उनकी लडकी  कॉलेज में पड़ती थी केमिस्ट्री लेब में वो हादसे का शिकार होकर बेहोश हो गई उसके सहछात्र उसे अस्पताल ले आए।ड्राक्टर अशोक उसके इलाज में इतने तन्मय हो गए कि वो यही भूल गए कि यह उनकी अपनी बेटी है उन्होंने एक पर्चे पर दवाएँ लिखकर  एक सह छात्र को दिया और दवाएँ मँगवाई उसी दुकान से जहाँ उनका कमीशन तय था दवाएँ दो हजार  रुपये की आई जिसके  पैसे चारों छात्रों ने आपस में चंदा कर के दे दिए थोडी देर बाद  फिर चार हजार रुपये की दवाई का पर्चा थमा दिया अब वे एक दूसरे का मुँह देख रहे थे एक हिम्मत जुटाकर बोला डॉक्टर साहब ये आपकी अपनी बेटी  है तब उन्हें ध्यान आया साथ ही ये भी याद आ गया कि ये सारी दवाएँ अस्पताल में भी हैं बाकी बची दवाएँ  भी उन्होंने वापस करवा दीं और कहा कि दुकानदार से कहना कि वो रुपय वापस कर दे डॉक्टर साहब बाद में हिसाब कर देंगे। 
एक वर्दी  धारी सड़क के किनारे खड़े होकर बस का इंतजार कर रहे थे तभी एक ट्रक उनके पास रुका ड्राइवर ने सौ का नोट उनके हाथ में थमाया और चल दिया  । वो बोले बिना माँगे ही रिश्वत मिल रही है तो हम लेने से इंकार क्यों करें  दिनेश का ड्राईविंग लाइ सेंस हाथों हाथ बन गया क्योंकि उसने  दलाल को पैसे दे दिए थे  । दूसरी ओर  रघुवीर को छः महीने हो गए थे चक्कर काटते काटते  लाइसेंस का अब भी कोई अता पता नहीं था।  कब मिलेगा इसका किसी को अंदाजा नहीं है। एक मैरिज गार्डन के चौकीदार से बात हुई वो बोलाआठ  हजार रुपये वेतन मिलता है  ।हम ने कहा फिर परिवार का खर्च कैसे चलता है वो बोला आराम से खाना फ्री रहना फ्री और पन्द्रह सोलह हजार रुपये ऊपर की कमाई हो जाती है एक साहब का ड्राइवर साहब की दवाई के नाम से लोगों से हजार पाँच सौ रुपये झटक लेता था एक पटवारी रिश्वत लेने पर सस्पेण्ड होने के बाद भी मुस्कुरा रहा था तीन महीने की छुटटी मनाने के बाद वो रिश्वत देकर फिर बहाल हो गया था।  इस भ्रष्ट तंत्र में रिश्वत के पैसों का बँटवारा ईमानदारी से होता है।  ऐसे अनंत उदाहरण हैं  मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि इसे पढ़कर सभी कहेंगे कि इसमें नई क्या बात हो कोई नई बात कहो।  इस देश में ऐसे बहुत कम हैं  रिशवत नहीं लेते है पर ऐसा कोई विरला ही होगा जिसने भारत में रहते हुए कभी किसी को रिश्वत न दी हो।  सरपंच के चुनाव में दोनी ही भ्रष्ट चुनाव लड़ रहे थे उनमें से एक को हारना था और एक जीतना  पर भ्रष्टाचार को  तो हर हाल ही में  जीतना था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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