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व्यंग्य: रिश्वत की लत

कई सरकारी महकमों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें रिश्वत लेने की लत लग चुकी है जैसे एक शराब के नशे का आदि जब तक शराब नहीं पी ले तब तक उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता उसी तरह ये रिश्वत खोर जब तक इन्हें रिश्वत नहीं मिल जाए तब तक इन्हें चैन नहीं मिलता तब तक इनका मूड भी खराब रहता है रिश्वत के नोट पाकर इनका मूड फ्रेश सो जाता है और इनमें ताजगी भर जाती है चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है। इनके बच्चे तथा इनकी पत्नी भी इनको मिली रिश्वत पर मौज करते हैं और पत्नी इन्हें हर समय रिश्वत लेने की प्रेरणा प्रदान करती रहती है।
ऐसे ही रिश्वत के आदि एक विभाग के सरकारी कर्मी दिवाकर जी थे जो महज पाँच हज़ार रुपये की रिश्वत लेते हुए रिटायर मेन्ट के दिन पहले विजिलेंस की टीम के द्वारा पकड़ा गए। दो दिन बाद उनका ऑफिस में भव्य विदाई समारोह था तैयारियाँ अंतिम चरण में थीं लेकिन दिवाकर जी दो दिन पहले ही हवालात में पहुँच गए थे । जिस समय उनका ऑफिस में विदाई समारोह पर हार फूल से स्वागत होना था उस समय पुलिस उनका जलालत भरा अभव्य स्वागत कर रही थी रिश्वत लेते हुए पकड़ाए जाने पर भी रिवाकर जी के चहरे पर कोई पछतावा अथवा दुख नहीं था । क्योंकि रिश्वत लेना उनका सिद्धान्त बन गया था वे अपने इस सिद्धान्त से कभी समझौता नहीं करते थे उन्हें वही संतोष था जो एक शहीद को शहादत के समत मिलता है। इसके पहले जब दिवाकर जी के रिटायर मेन्ट में दस दिन का समय बचा था तब उनके एक हितैषी उन्हें कड़ी हिदायत देकर गए थे कि अब रिटायर?भेन्ट तक किसी से एक रुपये की भी रिश्वत मत ले लेना वरना पकड़ा गए तो परेशानी में पड़ जाओगे दिवाकर जी ने उनकी बात मान ली चार दिन तक वे अपने निश्चय पर अटल भी रहे लेकिन उनकी बेचैनी कम नहीं हुई उधर पत्नी भी बेचैन हो गई क्योंकि जब वे ऑफिस से आते थे तब उनकी हर जेब से नोटों की बरसात होती थी। जिससे उनकी रोज मौज मनती थी चार दिन में सब बैचेन हो गए थे तो मौका देखकर उनकी पत्नी बोली आपने सारी नौकरी रिश्वत लेते हुए पूरी की रिश्वत आपकी नौकरी का हिस्सा बन गया अब रिटायर मेन्ट को थोड़े ही दिन बचे हैं मेरी यही तमन्ना थी कि जिस दिन आप रिटायर होकर घर आएँ उस दिन भी आपकी जेबें रिश्वत के नोटों से भरी हो लेकिन अब लगता है कि ये तमन्ना कभी पूरी नहीं होगी दिवाकर जी से पत्नी का दुख सहन नहीं हुआ वे खुद इस दुख को सहन नहीं कर पा रहे थे फिर उससे बोले तू चिन्ता मत कर अभी चार दिन बचे हैं चाहे कुछ भी हो जाए तेरी तमन्ना हर हाल में पूरी करूँगा दो दिन तो ठीक से गुजरे सब खुश थे जेबें फिर सै नोटों से भरी रहने लगी थी लेकिन तीसरे दिन किस्मत ने पलटा खाया और वे लोकायुक्त के द्वारा रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए दिवाकर जी को दो लाख रुपये महीना तनखा मिल रही थी फिर भी महज पाँच हजार रुपये के फेर में उन्होंने सब कुछ गँवा दिया था केस इतना मडबूत था कि सजा मिलना तय थी और वे सजा मिलने तक इसी मुगालते में रहे कि उनका बाल भी बाँका नहीं होगा।।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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