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हास्य व्यंग्य: दयनीय लोग

इन दिनों शहर में अनेक स्थानों पर साहित्यिक एवं सास्कधतिक आयोजन होते रहते हैं। ये आयोजन अक्सर रविवार को होते हैं। आयोजन चाहे कितने ही बड़े क्यों न हो पर किसी भी आयोजन में पचास से ज्यादा दर्शक कभी नहीं होते। ऐसे आयोजन बिरले ही होते हैं जिनमें पचास ज्यादा दर्शक आ जाते हों। लेकिन मंच जरूर भरपूर रहता है। आयोजक के कब्जे में माइक रहता है जिसका उपयोग बीच बीच में कर के वे अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। ऐसे में वे लोग बड़े दयनीय नजर आते हैं जो आयोजन में अपनी भागीदारी के लिए आयोजकों की चापलूसी करते नजर आते हैं। इन्हें उनके सामने बार बार झुकते देखकर लगता है कि इनमें रीढ़ की हड्डी है भी की नहीं। हो भी तो शायद कमर के पास से टूटी हुई हो।
हाल ही में शहर में एक साहित्यिक आयोजन हुआ। आयोजन को प्रदेश स्तरीय बताया गया। बड़े भारी भरकम व्यक्तित्व के धनी लोगों से मंच की शोभा बढ़वाई गई। हाॅल का किराया ही बारह हज़ार रुपये था। कार्यक्रम में भोजन की व्यवस्था भी रखी गई थी। इसका जिक्र आमंत्रण पत्र में भी किया गया था। भारी भरकम नाम वाले अतिथियों के नाम भी छापे गए थे। एक होटल वाले को खाने का आर्डर दिया गया था। बीच में चाय नाश्ते की भी व्यवस्था थी। इसके बाद भी आयोजन में पच्चीस से ज्यादा दर्शक नहीं थे। वे भी सब जाने पहचाने थे और आयोजक का लिहाज कर के आए थे। जो संचालन कर रहे थे वे अक्सर संचालन का दायित्व लेने की बड़ी जोड़ तोड़ करते थे। वे किसी को आगे आने ही नहीं देते थे। हाँलाकि वे भी कवि थे पर उनका ज्यादा समय तो आयोजन और आयोजकों की चापलूसी में बीत जाता था। लिखने का उन्हें मौका ही नहीं मिलता था। कुछ पंक्तियाँ तो वो हजारों बार सुना चुके थे फिर भी उन्हें दोहराने में संकोच नहीं करते थे। आयोजन समाप्त होने के बाद पच्चीस लोगों ने खाना खाया। आयोजकों से होटल वाले ने पूरे पैसे वसूल लिए और वो खाना होटल के कर्मचारी अपने घर ले गए। इनमें वे लोग बड़े दयनीय नजर आते हैं जिन्हें चार चार आयोजनों में शामिल होना पड़ता है। ये उनकी मजबूरी भी होती है और इसके लिए वे बेचारे बड़ी भागदौड़ करते हैं। बीस बीस किलोमीटर तक का उन्हें सफर करना पड़ता है। ऐसे ही आयोजन में शामिल होने के लिए एक कवि टाइप के व्यक्ति सतीश गुमनाम जा रहे थे। उनसे एक आम आदमी ने गलती से पूछ लिया कहाँ जा रहे हो? सतीश बोले चलो तुम भी बड़ा मज़ा आएगा। बेचारा वो आदमी मज़े की चाह में उनके साथ चल दिया। सभागार तो बहुत बढ़िया था। आयोजन के पहले जो नाश्ता दिया गया वो भी बहुत बढ़िया था। आम आदमी इससे बड़ा खुश हुआ। आराम दायक कुर्सियाँ थी और ऐ॰ सी॰ चल रहा था। आयोजन शुरू हुआ और जब भारी भरकम बुद्धिजीवियों ने अपने बेहट उबाऊ वक्तव्य प्रस्तुत किए तो वो आम आदमी घबरा गया। उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा था। उसका सर चकरा रहा था। उधर वो कवि टाइप के सतीश आराम से सो रहे थे। आयोजन के समाप्त होने के बाद वो आम आदमी सतीश बोला भाई ये तुमने मुझसे कौन से जन्म की दुश्मनी का बदला लिया है। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुम मुझे ऐसी जगह ले आए कि जहाँ मेरा मानसिक संतुलन गड़बड़ाने की संभावना नजर आने लगी थी। चलते चलते वो बोला अब कभी तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाऊँगा। सतीश बोले तुम आम आदमी ठहरे तुम क्या समझोगे इनको। यह सब बड़ी बड़ी हस्ती थे जिनकी तनखा तीन लाख रुपये से कम नहीं है। सुनकर वो आम आदमी हैरत से भर गया था। वो  बोला अच्छी बात हैं बड़े और विशिष्ट बुद्धिजीवी ऐसे ही होते होंगे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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