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व्यंग्य : दुर्योधनों से भरा देश

ऐसा लगता है कि सारा देश ही दुर्योधनों से घिर गया है ये दुर्योधन हर श्रेत्र के साम्राज्य पर अवैध रूप से कब्जा करके बैठे हैं ।जिनका संरक्षण करने वाले धृतराष्ट्र भी मौजूद हैं और शक्तिमान पितामह भी जो प्रतिज्ञा में बंधेकर ऐसे दुर्योधनों का साथ देकर अथर्म को बढ़ावा दे रहे हैं । हैरत की बात तो यह है कि पाँडवों को न्याय दिलवाने वाला कोई नजर नहों आ रहा है बेबस विदुर सिर्फ न्याय नीति धर्म की बातें करने के अलावा और कुछ भी नहीं कर पा रहा है और दुर्योधन के द्वारा किए हुए अपमान को सह रहा है।
ये दुर्योधन समाज सेवा हो या चिकित्सा या कोई और क्षेत्र का साम्राज्य हो सबके अलग अलग दुर्योधन हैं और धृर्तराष्ट्र हैं जो पाँडवों के हकों को छीनकर उन्हें निर्वासित कर खुद मजे कर रहे हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है साहित्य के क्षेत्र!में भी ऐसे तुर्योधनों और उनके दरबारियों की भरमार हैं ऐसे मंचीय कविता साम्राज्य पर भी दुर्योधन काबिज हो गए हैं। द्वापर में तो भगवान ने अवतार लेकर दुर्योधन और उसका साथ देने वालों का विनाश कर के धर्म की स्थापना कर दी थी लेकिन ये कलियुग है कलियुग के दुर्योधन बड़े चतुर चालाक और शातिर हैं यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसी में इतनी हिम्मत नहीं जो उन्हें हटाकर या नष्ट कर पाँडवों को न्याय दिला सके। इन दुर्योधनों से आम जनता सर्वाधिक त्रस्त हर हाल में जनता का ही शोषण हो रहा है इन दुर्योधनों की विलासिता की कीमत जनता को चुकाना पड़ रही है। धर्मराज युधिष्ठिर का वनवास समाप्त ही नहीं हो रहा है। शायद महाभारत की पुनरावृत्ति न हो मगर उम्मीद तो रख ही सकते हैं कि कभी न कभी तो दुर्योधनों का अंत होगा और ये साम्राज्य फिर धर्म की रक्षा करने वालों के हाथ में आएगा।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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