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व्यंग्य: बेहयाई के मजे।

ऐसे लोगों की भी आपको कोई कमी नहीं मिलेगी जो अव्वल दर्जे के ढीठ लोग होते हैं ये इतना बेहया होते हैं कि बड़े से बड़े अपमान को हँसकर सहन कर जाते हैं इन्हें कोई पद इनकी योग्यता से नहीं मिलता ये उसे अपने सम्मान को खोकर हासिल करते हैं इनकी कोई कितनी ही बेइज्जती क्यों न करे इन्हें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है ऐसी ही शहर के एक नेता हैं नन्नूलाल जी प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार हो पर नन्नूलाल जी सत्ताधीशों शों के इर्द गिर्द उनकी चापलूसी कर अपनी बेइज्जती को सहन कर मुस्कुराते हुए नजर आते हैं।
नन्ललाल जी को यह कला अपने पिताजी से विरासत में मिली थी उनके पिताजी राखीलाल सेमल खेड़ा के सरपंच के करीबी बनकर रहते थे जो भी सरपंच बनता था वे उसके खासमखास बन जाते थे वे नन्नूलाल से षे कहते अगर शहद को पाना है तो मधुमक्खी के डंक सहकर भी कोशिश करना होगा। नन्नलल! जब बड़े हुअः तो गाँव में किसी की भी शादी होती थी उनके बारातियों में नन्नूलाल सबसे आगे रहते थे । राजनीति भे जब नन्नूलाल जी ने प्रवेश किया तो थोड़े ही दिनों में वे सत्ता की मलाई की झपटने में सफल होने लगे थे। जब मंत्री का जिले में कहीं जाने का दौरा होता तो नन्नूलाल जी पहले से ही उनकी गाड़ी में बैठ जाते थे फिर किसी भी हाल में अपनी जगह से नहीं हिलते थे एक बार उनकी इस सरकत से एक वरिष्ठ नेता को मंत्री जी की गाड़ी में बैठने का सुख प्राप्त नहीं हुआ तो उन्होंने नन्नूलाल जी के अपने सभर्थकों से जमकर कुटाई करा दी थी उन्हें लोगों ने पटक पटक कर मारा था और इसकी ख़बर उन्होंने मंत्री जी को भी नहीं लगने दी थी। उन्हें पीटने के बाद सभी ने यह सोच लिया था कि अब नन्नूलाल जी ऐसी हरकत कभी नहीं करेंगे पर यह क्या जब कार्यक्रम खत्म कर मंत्री जी आए तो वे जाने कहाँ से प्रकट होकर फुर्ती से गाड़ी में बैठ गए थे मंत्री जी ने उनसे ये पूछा कि आपकी यह हालत किसने कर दी तो नन्नूलाल जी मुस्कुराकर बोले दो बैल लड़ रहे थे हम उनके बीच में आ गए मंत्री को सच बात मालूम थी इसलिए वे झूठ सुनकर हँसने लगे थे । । 
यह देखकर नन्नूलाल भी हँसने लगे थे । ये उन जैसे लोगों में शामिल थे जो हलवाई की कढ़ाई को खुरचन के लोभ में साफ करते हैं ।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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