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व्यंग्य: लुटता पिटता आम आदमी

इस देश के सारे खास आदमी आम आदमी की चिंता में मुटिया रहे हैं और!आम आदभी चिंता मिटाने की फिक्र!में दुबला हुआ जा रहा है आम आदमी को कम से कम मजदूरी या वेतन भिलता सै और अधिक से अधिक उसको ही लूटा जा रहा है चाहे सरकारी दफ्तर हो या अस्पताल हो या बाजार में बिकता हुआ कोई सामान हो वो सामान आम आदमी को कभी सस्ता नहीं मिलता शहर के एक मेडिकल स्टोर पर एक आम आदमी इंजेक्शन लेने आया दुकानदार ने उसकी कीमत बारह सौ रुपये बताई तो आम आदमी बोला भैया इसमें कुछ कम नहीं होंगे दुकानदार!रूखाई से बोला देख नहीं रहे इसकी एम आर पी चौदह सौ रुपये है दो सौ कम तो कर दिए अब क्या मुफ्त में लोगे क्या। वो आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे देकर चला गया एम आर नया था उसने कुछ देर पहले उस दुकानदार को वो इंछेकूशन दो सौ रौपये भें दिया था दुकानदार ने उस आम आदमी से एक हजार झपट लिए थे वो एम आर कुछ नहीं बोला अगर बोलते तो वो दुकानदार उसकी नौकरी खा जाता  
चुनाव में इस आम आदमी को दो हजार रुपये देकर खरीदने की कोशिश की जाती है और बाद में उसी आम आदमी को बेरहमी से लूटकर खास लोग मजे करते है। सुब्ह नीलामी में आम आदमी किसान के रूप में जो सब्जी दो रूपये किलो बेचता है उसे ये खास लोग चालीस रुपये किलों में बेचते हैं इन खास लोगों के संगठन हैं। कोई भाव गिराएगा तो ये उस पर इतना भारी जुर्माना ठोक देंगे कि वो फिर कभी ऐसी गलती नहीं करेगा एक आम आदमी ने इसी बात पर बहस कर ली तो सारे खास लोगों ने उसको घेर लिया और उसकी जमकर पिटाई कर दी वो अकेला पिटता रहा कोई उसे बचाने भी नहीं आया एक आम आदमी ने बिल्डर से जो मकान पचास लाख रुपये में खरीदा था उससे अच्छा मकान दूसरे आम आदमी ने बीस लाख रुपये में बनवा लिया था। दूसरी और उस आदमी से बिल्डर ने तीस लाख रुपये ज्यादा झटक लिए थे जो उस आम आदमी ने होम लोन से लिए थे जिनका ब्याज उसे अपने जीवन पर्यंत तक देना होगा आम आदमी को तरह तरह के प्रलोभन देकर लुभाया जाता है उसे सुविधाओं के नाम पर लाली पाप पकड़ाए जाते हैं हमने एक आम आदमी से पूछा कि क्या करते हो वो बोला एक मेडिकल सूटोर पर दो सौ रुपये रोज में सुब्ह नौ बजे से रात दस बजे तक काम करता हूँ तब वो खास आदमी दो सौ रपये देता है जो दूसरे आम आदमी से एक झटके में इस से पाँच गुना रुपया झटक लेता है फिर सरकार को कोसता है कि सरकार आम आदमी को बड़ी सुविधाएँ दे रही है और आम आदमी इसी अपराध बोध के साथ जीता रहता है कि वो सरकार के रहमो करम पर जिंदा है। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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