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कहानी: बुज़दिल पिता

शंकर लाल आज सेमलखड़ा गाँव का सबसे प्रभावशाली
व्यक्ति था। पिछले दस साल से वो गाँव का सरपंच था। उसके पास अस्सी एकड़ जमीन थी और गाँव में एक बड़ा मकान था। उसकी उम्र पैंतीस साल थी और यह सब उसने पन्द्रह सालों में हासिल किया था। उसके पिता चमन लाल गाँव के सबसे बुजदिल इंसान थे। जिसके कारण वे अपने पिता की चालीस एकड़ जमीन से हाथ धो बैठे थे।दो मकान उनके दूसरों ने हड़प लिए थे और वे एक झोपड़ी में रहकर दूसरों के खेतों में मजदूरी कर रहे थे। हैरत की बात यह थी कि वे अपने ही खेत में मजदूरी करते थे। जिसे दूसरों ने हड़प लिया था। अब वे अत्यंत बूढ़े हो गए थे पर अभी भी उनकी बुजदिली दूर नहीं हुई थी।
साठ साल पहले जब शंकर लाल के दादाजी देवीलाल जी का निधन हुआ था तब वे अपने बेटे चमनलाल को विरासत में चालीस एकड़ जमीन तथा दो बड़े मकान, आठ भैंसें, छः बैल और बहुत सारी संपत्ति छोड़कर गए थे। मगर चमनलाल बहुत डरपोक किस्म के इंसान थे। वे अपने पिता की संपत्ति को सँभाल नहीं सके। गाँव के दबंगों ने उनकी पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया। उन्हें उनके ही मकान से बेदखल कर दिया था। डर के मारे उन्होंने इसकी पुलिस में भी रिपोर्ट नहीं की थी। एक आवेदन तक किसी को लिखकर नहीं दिया था। और एक छोटी झोपड़ी बना ली थी उसमें रह रहे थे। शंकरलाल ने आठवीं तक की पढ़ाई सेमल खेड़ा गाँव में ही पूरी की थी। तब तक शंकर लाल एक साधारण बालक ही था। जिसका लड़ाई झगड़ों से कोई वास्ता नहीं था। नवमीं कक्षा में उसे अपने गाँव से तीस किलोमीटर दूर विजयनगर के हायर सेकेण्डरी स्कूल में प्रवेश लेना पड़ा। यहाँ आकर उसे ये अहसास हुआ कि अगर वो डरकर रहा तो ये दुनिया उसे कच्चा चबा जाएगी। स्कूल में दबंग लड़कों का गुट था। उनका काम था किसी से पैसे छीन लेना, किसी का टिफिन छीन लेना, परेशान करना। शंकर लाल के साथ भी उन्होंने ऐसा करना चाहा तो शंकर लाल ने दिमाग से काम लिया। वो जानता था कि ये डरे सहमे लड़के उसका साथ नहीं देंगे। उसने उन्हीं के गुट से दो लड़कों को अपनी तरफ मिला लिया। जो गुट के सरगना अनिल को बहलाकर ऐसी जगह ले गए जहाँ उसका कोई हिमायती नहीं था। वहाँ शंकरलाल ने उसकी जी भर कर पिटाई की और फिर छोड़ दिया। अनिल ने यह बात किसी को नहीं बताई पर लड़कों को इसका पता चल गया और उसका रुतबा कम होने लगा और बहुत से लड़के शंकर के साथ आ गए। अब स्कूल में शंकर के दौर की शुरूआत हो गई थी। कॉलेज तक पहुँचते पहुँचते शंकर लाल विजयनगर का शक्तिशाली छात्र नेता बन गया था। विधायक भी उसकी बात मानते थे। वो कोई अपराध नहीं करता था बस वो डरता किसी से नहीं था और गलत लोगों का कभी साथ नहीं देता था। कॉलेज से बी ए करने के बाद शंकरलाल ने अपने गाँव का रुख किया। तब तक उसके नाम का खौफ सेमल खेड़ा में भी छा गया था। यहाँ आकर सबसे पहले उसने अपने बाप दादों की जमीन को अवेध कब्जे से छुड़ाया। जो उसे जान से मारने आए उनकी उसने जीभर के मरम्मत की। पुलिस तक भी उनको नहीं पहुँचने दिया। पस्त होकर उन्हें जमीन छोड़ना पड़ा। उनकी सारी दबंगई शंकरलाल ने खत्म कर दी थी। गाँव के सारे गरीब मजदूर तबके के लोग शंकरलाल का साथ दे रहे थे। उसने अपने दोनों मकान भी वापिस ले लिए थे। इसके अलावा बीस एकड़ जमीन उसने ऐसी खरीदी थी जो विवादित थी। उस पर पहले दो मर्डर हो गए थे। शंकरलाल ने उनकी हेकड़ी भी निकाल दी थी। शंकरलाल का इतना दब-दबा था कि किसी की मजाल नहीं थी जो उससे झगड़ा मौल ले सके। जब सरपंच का चुनाव आया तब शंकरलाल ने नामाँकन दाखिल किया। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई जो उसके खिलाफ चुनाव लड़ सके। वो निर्विरोध गाँव का सरपंच चुना गया। तबसे अब तक वही गाँव का सरपंच था। उसे पूरे पन्द्रह साल होने जा रहे थे। उसकी एक विशेषता थी वो भ्रष्ट नहीं था। बेईमान नहीं था। गलत लोगों का साथ नहीं देता था। निर्दोषों पर अत्याचार नहीं करता था। किसी से जबरन उलझता नहीं था और अगर कोई उससे टकराने की कोशिश करता तो उसे चकनाचूर करके ही वो दम लेता था। इसीलिए वो सबका चहेता था। आज तक वो थाने में किसी अपराधी को छुड़ाने नहीं गया था। इन पन्द्रह सालों में सेमल खेड़ा गाँव का खूब विकास हुआ था। गाँव में अपराध होते ही नहीं थे। इसी कारण से कोई उसके खिलाफ सरपंची के चुनाव में खड़ा नहीं होता था। पिताजी जितने डरपोक थे उसके विपरीत शंकरलाल उतना ही दबंग था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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