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व्यंग्य: प्रशंसा की भूख

योगेश कुमार जी उन जैसों लोगों में शामिल थे जिन्हें अपनी प्रशंसा सुनकर बहुत ख़ुशी होती थी उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी इसलिए वे खूब पैसा खर्च कर के अपनी प्रशंसा कराते थे मुफ्त खोरों की मंडली उनके साथ हमेशा रहती थी ।उन्हें कवि बनने की धुन सवार हुई थी तो कविता से उनका दूर दूर तक वास्ता नहीं होने के बावजूद भी उनके चार कविता संग्रह छप चुके थे वे शहर के स्वघोषित वरिष्ठ कवि भी थे।
एक बार वे किसी मुशायरे में गए तो उन्हें ग़ज़लकार बनने की सनक सवार हुई ऊल जलूल बेसिर पैर की बहुत सारी ग़ज़ल उन्होंने लिख डालीं ताली बजाने वालों और वाह वाह करने वालों की उनके पास कोई कमी नहीं थी जो खूब उनकी झूठी तारीफों के पुल बाँधकर उनके पैसों पर मौज करते थे। ग़ज़लकार बनने के लिए उनूहोंने नगर के नूर साहब के घर के बहुत चक्कर लगाए थे उनकी खूब खुशामद की थी तब नूर साहब ने उनकी बेसिर पैर की चार ग़ज़लों ठीक करने के फेर में अपनी जादुई लेखनी से चार ग़ज़ल !लिखकर दी थीं उन चार ग़ज़लों को योगेश जी हजारों लाखों बार रिपीट कर चुके थे और वरिष्ठ शायर होने का ठप्पा भी लगा बैठे थे । पिछले दिनों उनके पाँचवें कविता संग्रह का लोकार्पण हुआ था जिस में उनका एक लाख रुपया खर्च हो गया था एक लाख रुपया कविता संग्रह को प्रकाशित कराने में खर्च हुआ था दो लाख रुपये खर्च करने के बदले उन्हें जो झूठी प्रशंसा मिली थी उससे वे फूले नहीं समा रहे थे उनकी रचनाओं को कालजयी बताया गया था उन्हें अनूठा कवि कहा गया था कहने वाले सब उनके खरीदे हुए लोग थे। योगेश जी को साहित्यिक कार्यक्रमों में शाभिल होने का शौक था इस के लिए वे सारा पैसा अपनी जेब से खर्ट करते थे इसके बदले में उन्हें कार्यक्रम का मुख्य अतिथि अथवा अध्यक्ष बनने का अवसर प्राप्त होता था और वे इसी में खुश हो जाते थे योगेश जी की उम्र चालीस वर्ष की हो गई थी उनके पिताजी का बड़ा बिजनेस था उनके पास कोई काम धाम तो था नहीं पिताजी सारा बिजनेस अच्छी तरह से सम्हाल रहे थे। पिताजी उन्हें खूब पैसा देते थे जिसे वे जी खोलकर खर्च करते थे। झूठी तारीफ करने वाले उनका लाभ उठाते रहते थे। उनकी सुशील अकेला जी जो कि शहर के अच्छे कवि थे से मन मुटाव चल रहा था उनकी गलती यही थी । कि अकेला जी ने उनकी असलियत खोलकर उनके सामने रख दी थी। तब से वे अकेला जी को अपना शत्रु मानते थे । पर अकेला जी कलम के धनी थे उनका बड़ा नाम था इसलिए योगेश जी चाहकर भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते थे। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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