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व्यंग्य: जलने जलाने वाले

संसार जलने जलाने वाले लोगों से भरा पड़ा है जलने वाले लोगों में उनकी संख्या ज्यादा है जो बराबरी नहीं कर पाते। औ जो बराबरी करते हैं वे एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं एक पड़ोसी ने अपने अच्छे भले घर को इसलिए गिरवा दिया क्योंकि उसके पड़ोसी ने उससे अच्छा घर बनवा लिया था उसने जब तक उससे अच्छा घर नहीं बनवा लिया तब तक चैन नहीं लिया । उससे अच्छा घर बनवाकर उसके कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँची जो जलन थी वो मिट गई। लेकिन उस जलन को मिटाने में वो गले गले तक कर्ज में डूब गया चटनी से रोटी खाने तक की नौबत आ गई।
हमारेशहर के कन्हैयालाल जी से बात हुई तो बोले आजकल हमसे लोग बहुत जलते हैं हमने किसी का क्या बिगाड़ा है ।हमने कहा सबसे अधिक कौन जलता है वो बोले हमारा सगा छोटा भाई ।हमने कहा तुम उसे जलाते क्यों हो वे बोले ये तो कोई बात नहीं हुई ।हमने कहा क्योंकि तुम्हें उसको जलाने में मजा आता है तुम सरकारी नौकरी करते हो वो प्राइवेट तुम्हारा मकान पक्का है उसका खपरैल वाला तुम उसे अपनी खुशी में शामिल नहीं करते तो वो तुम से जलता है। उन दोनों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती आए दिन उनके बीच लड़ाई होती है अब तो पुलिस भी उनकी रिपोर्ट नहीं लिखती उनका तो रोज का काम है।  
जलने जलाने के फेर में लोगों ने अपने सुख चैन को हराम कर रखा है। वे जीवन का आनंद नहीं उठा पाते दूसरों को देखकर जलाने वाले अपनी जलन मिटाने के लिए सामने वाले को नीचा दिखाने का अवसर ढूँढते रहते हैं शादी विवाह में फिजूलखर्ची करने वाले लोग महज दिखावे के लिए क्षमता से बाहर खर्च कर बैठते हैं जिसमें उनकी जीवन भर की कमाई लग जाती है और?कर्ज के दल दल में फँष जाते हैं।
पड़ोसी ने सेकण्ड हैण्ड कार खरीदी तो खुद जरूरत न होने पर भी मँहगी नई कार खरीद लेते हैं ताकि पड़ोसी को जला सकें एक सरकारी विभाग में कार्यरत रिटायर मेन्ट के एक दिन पहले रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया पुलिस उसके घर का वैभव देखकर चकित रह गई एक जवान बोला आपके पास जब इतना सब कुछ था तो सेवानिवृत्ति के एक दिन पहले रिश्वत लेने की क्या जरूरत थी। पर ये भी उन लोगों में से थे जिन्हें दूसरों को जलाने में मजा आता है। इसी फेर में उन्होंने अपना बुढ़ापा खराब कर लिया था । उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी न ही पछतावा था इन्हें विश्वास था कि वे भारी रिश्वत देकर मामला रफा दफा कर लेंगे अब ऐसे लोगों की गलत सोच समझ पर क्या कहा जा सकता है।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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