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व्यंग्य: सियासत की गिरवट से ऊबकर

हरिराम जी ने जिस भ्रष्ट नेता बदलूसिंह के विरोध में विरोधी राजनैतिक पार्टी ज्वाइन की थी उसी बदलू सिंह के दल बदल कर उनकी पार्टी में आ जाने से व्यथित होकर उन्होंने सक्रिय राजनैतिक जीवन से संन्यास ले लिया था और वे अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में व्यस्त हो गए थे हरिराम के इस कदम से उनके आस पास के चापलूसों से उनका पीछा छूट गया था साथ ही उनका जमीर भी कायम था। 
हरिराम यह देखकर हैरान थे कि चभी जो बदलूसिंह के विरोध में उनके साथ आंदोलन करते थे वे अब बदलूसिंह की चापलूसी कर रहे थे बदलूसिंह पहले जिस पार्टी के विधायक थे उस पार्टी ने उन्हें विधायक का टिकट नहीं दिया था इस से क्षुब्ध होकर उन्होंने हरिराम जी की पार्टी ज्वाइन कर टिकट भी हासिल कर लिया था और चुनाव जीतकर फिर विधायक बन गए यह देखकर अवसर वादियों ने अपना रुख बदल लिया था। अब सारे अपने जमीर को गिराकर बदलू सिंह को खुश करने में लगे हुए थे। केवल हरिराम ही ऐसे थे जो बदलूसिंह के चुनाव जीतने के बाद उनसे मिलने नहीं गए थे। बदलूसिंह के चाल चलन में कोई फर्क नहीं आया था वे अब भी उतने ही भ्र्ष्ट थे और दोनों हाथों से धन लूट रहे थे । पार्टी ने उनके खिलाफ सारे मामले वापस ले लिए थे। । ताज्जूब की बात तो ये थी समाज ने उनके भ्रष्टाचार को अपनी मौन सहमति दे दी । शायद लोग ये अनुमान लगा बैठे थे कि उनकी जगह जो उनके पद पर बैठेगा वो भी वही करेगा जो बदलू सिंह कर रहे हैं। तो फिर बदलू सिंह से वे नफरत क्यों करें यही कारण उनके चुनाव जीतने का रहा होगा। हरिराम जी को भी अपनी इस स्थिति पर कोई मलाल नहीं था। वो भी एक भ्रष्ट की जी हुजूरी करने से बच गए थे जो करने पर उनका जमीर गिर जाने से बच गया था।। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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