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व्यंग्य : मुखौटा लगाए गिरगिटिए

जिस समाज के लोगों का नैतिक पतन हो जाता है सोच घटिया हो जाती है उस समाज के लोगों के बीच मुखौटा लगाए गिरगिटिए टाइप के लोगों का बडा महत्व होता है इनकी अपनी कोई सोच नहीं होती ना हीं कोई विचारधारा माहौल देखकर अपना रंग बदलने में ये माहिर होते हैं और वैसा ही मुखौटा अपने चेहरे पर लगा लेते हैं।
ऐसे ही शहर के नेता खूबचंद जी भी हैं सुब्ह वे बूचड़खाने की माँग करने वालों के साथ थे तो दोपहर में वो गौशाला का चंदा इकठ्ठा करने वालों का साथ दे रहे थे शाम को वे जीवदया मंडल की बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। 
लोग तो उन्हें अपने बीच पाकर ख़ुश हो जाते थे एक व्यक्ति ने अपनी पिताजी की तेरहवीं पर मृतूयुभोज न देते हुए उन रुपयों से सरकारी स्कूल में एक कमरा बनवाया था उस कार्यकूरम के मुख्य अतिथि के रूप में खूबीलाल जी ने भाषण देते हुए मृत्युभोज का प्रबल विरोध कर कमरा बनवाने वाले की खूब तारीफ की थी। और दो घंटे बाद खूबीलाल जी एक तेरहवीं में आयोजित मृत्युभोज में शामिल हो गए थे। और विशाल जनसमूह को देखकर अपना राजनैतिक लाभ उठा रहे थे वहाँ उन्होंने मृत्युभोज के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला था। खूबीलाल जी ने चुनाब के समय जिस भ्रष्ट नगरपालिका अधिकारी को नौकरी से हटाकर जेल भिजवाने का वादा जनता से किया था चुनाव जीतने के बाद उसे ही अपना खास चहेता बना लिया था जनता से वो यही कहते रहे कि अब वो सुधर गया पर ऐसा हुआ नहीं न वो सुधरा न ये सुधरे बल्कि दोनों ने मिलकर भ्रष्टाचार को चरम सीमा पर पहुँचा दिया था। खूबीलाल किसी से कह रहे थे कि क्या करें समाज ने ही भ्रष्टाचार को स्वीकार लिया है जब तक उन से पैसे न लो तब तक वे ये मानने को ही तैयार नहीं होते कि बिना लेन देन के उनका काम भी हो सकता है। नैतिकता की बात करके जो गलत काम करता है उस पर कोई उँगली उठाने को तैयार नहीं होता इस पतनशील समाज में अच्छे लोगों की पूछ परख करने वाला कोई नहीं है। वो सभाज में उपेक्षित जीवन जी रहा है और असफलता ही उसे मिल रही है लोग सिर्फ सफलता ही देखते हैं सफल होने के लिए जो उन्होंने घोर कर्म किए हैं उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। यह गिरगिटिए लोग बहुत लोगों के आदर्श बनते जा रहे हैं। अगर यह सब चलता रहा तो महापुरुषों के आदर्श और उससे भरी उनकी जिंदगी अतीत के विषय हो जाएँगे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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